Islam Shari'at Se Hai Tabiyat Se Nahi — यह एक बहुत गहरी और जरूरी बात है। इंसान की तबीयत, पसंद, नापसंद, माहौल और समाज समय के साथ बदलते रहते हैं, लेकिन अल्लाह की शरीअ़त नहीं बदलती।
आज अक्सर हम किसी दीन के हुक्म को अपनी पसंद से परखते हैं:
- “मुझे यह बात अच्छी नहीं लगती।”
- “मेरी तबीयत इसे स्वीकार नहीं करती।”
- “आज के जमाने में ऐसा कैसे हो सकता है?”
- "हमारे बुज़ुर्गों ने ऐसा नहीं किया।"
- “हमारे घर में तो ऐसा नहीं होता।”
- “लोग क्या कहेंगे?”
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Islam mein faisla tabiyat aur pasand se nahi, Quran aur Sunnat se hota hai. |
लेकिन एक सच्चे मुसलमान का असली सवाल यह होना चाहिए:
“अल्लाह और उसके रसूल ﷺ ने इस बारे में क्या हुक्म दिया है?”
यही ईमान और अपनी इच्छा के बीच का फर्क है।
और इसके साथ कुछ सवाल हमें अपने आप से भी करना चाहिए:
- क्या हमने अपने ज़िंदगी के हर मामले में अल्लाह के हुक्म और नबी करीम ﷺ की सुन्नत को अपना लिया है?
- क्या हम दीन को शरीयत से लेकर चल रहे हैं या अपनी तबियत से ?
- क्या हम इस्लाम को सिर्फ अपनी पसंद की बातों तक सीमित कर चुके हैं?
- क्या हम अपनी तबीयत, रस्मों और समाज की रिवायतों को दीन से ऊपर रखने लगे हैं?
यही वह सवाल है जिस पर हर मुसलमान को गंभीरता से गौर करने की ज़रूरत है।
इस आर्टिकल Islam Shari'at Se Hai Tabiyat Se Nahi में आइए हम क़ुरआन और सुन्नत की रोशनी समझते हैं कि दीन असल में अल्लाह के कानून यानी शरीअत से है हमारी पसंद या ना पसंद से नहीं।
इस्लाम का मतलब अपनी मर्जी चलाना नहीं
इस्लाम केवल कुछ दीनी रस्मों का नाम नहीं है। इस्लाम का मतलब है अल्लाह के सामने समर्पण और उसके आदेश को मानना।
अल्लाह तआला फरमाता है:
“और जो व्यक्ति अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करे, वह बहुत बड़ी सफलता प्राप्त कर गया।” (सूरह अल-अहज़ाब 33:71)
यानी कामयाबी इस बात में नहीं कि हम अपनी तबीयत के मुताबिक जिंदगी गुजारें, बल्कि असली कामयाबी यह है कि हमारी जिंदगी अल्लाह की पसंद के मुताबिक हो।
जब अल्लाह और रसूल ﷺ का फैसला आ जाए
कुरआन की यह आयत इस विषय की सबसे स्पष्ट दलीलों में से एक है।
अल्लाह तआला फरमाता है:
“किसी मोमिन मर्द और मोमिन औरत के लिए यह उचित नहीं कि जब अल्लाह और उसका रसूल किसी मामले का फैसला कर दें तो उनके लिए उस मामले में कोई और विकल्प बाकी रहे।”(सूरह अल-अहज़ाब 33:36)
इस आयत पर गौर कीजिए।
अल्लाह ने यह नहीं कहा कि:
“अगर तुम्हारी तबीयत चाहे तो मान लेना।”
बल्कि मामला साफ कर दिया गया कि जब अल्लाह और उसके रसूल ﷺ का हुक्म साबित हो जाए, तो मोमिन का रवैया सुनना और मानना होना चाहिए।
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“मेरी तबीयत नहीं मानती” — यह सोच कहाँ तक सही है?
इंसान की तबीयत हमेशा सही फैसला नहीं करती।
कभी हमें कोई चीज अच्छी लगती है जबकि वह हमारे लिए नुकसानदेह होती है और कभी कोई चीज कठिन लगती है लेकिन वही हमारे लिए बेहतर होती है।
अल्लाह तआला फरमाता है:
“हो सकता है कि तुम किसी चीज को नापसंद करो जबकि वह तुम्हारे लिए अच्छी हो, और हो सकता है कि तुम किसी चीज को पसंद करो जबकि वह तुम्हारे लिए बुरी हो। अल्लाह जानता है और तुम नहीं जानते।”
(सूरह अल-बक़रह 2:216)
इसलिए मुसलमान का पैमाना अपनी तबीयत नहीं बल्कि शरीयत होनी चाहिए।
शरीयत पहले, तबीयत बाद में
इसका मतलब यह नहीं कि इस्लाम इंसान की भावनाओं और स्वभाव को बिल्कुल नजरअंदाज करता है।
बल्कि इस्लाम इंसानी कमजोरी को समझता है।
रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया:
“दीन आसान है।”
(सहीह अल-बुखारी 39)
इस्लाम में बीमारी, सफर, मजबूरी और दूसरी वास्तविक परिस्थितियों के लिए शरीयत ने रुख्सतें भी रखी हैं।
लेकिन रुख्सत भी शरीयत का हिस्सा है, अपनी मनमानी नहीं।
यानी जहाँ अल्लाह ने आसानी दी है वहाँ आसानी अपनाना सुन्नत है, और जहाँ अल्लाह ने कोई सीमा तय की है वहाँ अपनी इच्छा से उस सीमा को बदलना सही नहीं।
इबादत अपनी पसंद से नहीं, सुन्नत के मुताबिक
नमाज़, रोज़ा, हज, ज़कात और दूसरी इबादतों का तरीका हम अपनी पसंद से तय नहीं कर सकते।
रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया:
“जिसने हमारे इस मामले (दीन) में ऐसी चीज पैदा की जो इसमें से नहीं है, वह रद्द है।”
(सहीह अल-बुखारी 2697; सहीह मुस्लिम 1718)Z
इस हदीस से एक बहुत बड़ा सिद्धांत सामने आता है
है जिसकी दलील कुरआन और सुन्नत से हो।
सिर्फ यह कह देना कि:
“हमारे बुजुर्गों के जमाने से ऐसा होता आया है।”
किसी को शरीयत में साबित नहीं कर देता।
दीन में “मुझे अच्छा लगता है” दलील नहीं
कई बार इंसान किसी काम को इसलिए सही समझता है क्योंकि:
- उसे वह अच्छा लगता है।
- उसके खानदान में सदियों से ऐसा होता आया है।
- समाज में उसका चलन है।
- बहुत सारे लोग उसे करते हैं।
- उसके दिल को उससे सुकून मिलता है।
- उसके बड़े बुज़ुर्ग ऐसा करते थे।
लेकिन दीन के मामले में असली सवाल यह है:
क्या अल्लाह और उसके रसूल ﷺ से इसकी दलील मिलती है?
अगर कोई काम शरीयत से साबित है, तो हमारी तबीयत उसे पसंद करे या न करे, हमें उसे मानना होगा।
और अगर कोई काम इबादत के रूप में दीन में शामिल किया जा रहा है लेकिन उसकी कोई शरीयत से दलील नहीं, तो केवल लोगों की पसंद उसे दीन नहीं बना सकती।
सहाबा का रवैया कैसा था?
सहाबा ने दीन को अपनी इच्छाओं के अनुसार बदलने की कोशिश नहीं की।
जब उन्हें अल्लाह और उसके रसूल ﷺ का आदेश मालूम होता, तो वे सुनते और पालन करते।
यही सच्चे ईमान का रास्ता है।
अल्लाह तआला फरमाता है:
“ईमान वालों का कहना तो यह है कि जब उन्हें अल्लाह और उसके रसूल की ओर फैसला करने के लिए बुलाया जाता है तो वे कहते हैं: हमने सुना और हमने मान लिया।”
(सूरह अन-नूर 24:51)
यही है एक मोमिन का रवैया:
सुना → समझा → माना
न कि:
सुना → अपनी तबीयत से तौला → पसंद आया तो माना, पसंद नहीं आया तो छोड़ दिया।
हर दीन का मामला अपनी तबीयत से तय करना खतरनाक है
अगर हर व्यक्ति अपनी तबीयत को दीन का पैमाना बना ले तो एक ही मामले में हजारों “इस्लाम” बन जाएंगे।
- किसी को नमाज़ कठिन लगेगी।
- किसी को पर्दा पसंद नहीं होगा।
- किसी को रोज़ा कठिन लगेगा।
- किसी को ब्याज छोड़ना मुश्किल लगेगा।
- किसी को शराब छोड़ना पसंद नहीं होगा।
- किसी को विरासत का अल्लाह द्वारा तय किया हुआ हिस्सा पसंद नहीं आएगा।
तो क्या हर व्यक्ति अपनी पसंद के अनुसार शरीयत बदल देगा?
नहीं।
इसीलिए दीन का पैमाना इंसान की इच्छा नहीं बल्कि वही और सुन्नत है।
लेकिन एक जरूरी बात: हर पसंद नापसंद गुनाह नहीं
यहाँ एक बात समझना बहुत जरूरी है।
अगर किसी व्यक्ति की प्राकृतिक पसंद किसी जायज़ चीज में अलग है, तो केवल पसंद अलग होने से वह गुनाहगार नहीं हो जाता।
मसलन किसी को कोई जायज़ खाना पसंद है और किसी को नहीं। किसी को कोई रंग पसंद है और किसी को दूसरा।
इसका शरीयत से कोई टकराव नहीं।
समस्या तब पैदा होती है जब इंसान कहे:
“मुझे यह शरीयत का हुक्म पसंद नहीं, इसलिए मैं इसे नहीं मानूंगा।”
यानी अपनी व्यक्तिगत पसंद को अल्लाह के आदेश के ऊपर रखना गंभीर समस्या है।
दीन में आसानी है, लेकिन मनमानी नहीं
इस्लाम आसान दीन है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि इंसान अपनी इच्छा के मुताबिक हर चीज को हलाल और हराम घोषित करने लगे।
अल्लाह ने हलाल और हराम की सीमाएं निर्धारित की हैं।
अल्लाह तआला फरमाता है:
“और अपनी ज़बान से झूठ बोलकर यह न कहो कि यह हलाल है और यह हराम है, ताकि तुम अल्लाह पर झूठ बांधो।”
(सूरह अन-नहल 16:116)
इसलिए किसी चीज को केवल अपनी पसंद या नापसंद के आधार पर हलाल या हराम कहना भी सही नहीं।
आज हमें खुद से कुछ सवाल पूछने चाहिए
अगर हम सच में अपने ईमान का जायज़ा लेना चाहते हैं तो खुद से पूछें:
- ❶ क्या मैं कुरआन और सहीह सुन्नत को अपनी पसंद के ऊपर रखता हूँ?
- ❷ जब कोई शरीयत का हुक्म मेरी तबीयत के खिलाफ हो तो मेरा रवैया क्या होता है?
- ❸ क्या मैं दीन को अपने समाज और रिवाज से मापता हूँ?
- ❹ क्या मैं किसी काम को इसलिए सही मानता हूँ क्योंकि “सब लोग ऐसा करते हैं”?
- ❺ क्या मैं अपनी राय को कुरआन और सुन्नत के सामने बदलने के लिए तैयार हूँ?
इन सवालों के जवाब इंसान को अपने बारे में बहुत कुछ बता सकते हैं।
👉 Jinho ne Allah ke Ahkaam Aur Haq ka inkar kya, Padhen Yahan unke Khaufnak Anjam se Mutalliq
सच्चे मुसलमान की पहचान क्या है?
सच्चा मुसलमान वह नहीं जो केवल अपनी पसंद की बातें दीन में स्वीकार करे।
बल्कि सच्चा मुसलमान वह है जो कहे:
“या अल्लाह! जो बात तेरे कुरआन और तेरे रसूल ﷺ की सही सुन्नत से साबित है, मैं उसे अपनी पसंद और नापसंद से ऊपर रखूंगा।”
क्योंकि अल्लाह हमारा पैदा करने वाला है और हम उसके बंदे हैं।
बंदे का काम अपने रब को आदेश देना नहीं, बल्कि अपने रब के आदेश को मानना है। यानी सिर्फ़ अपने रब "को" ही नहीं मानना है बल्कि रब "की" भी माननी है।
Conclusion: Islam Shari'at Se Hai Tabiyat Se Nahi
तो यह बात आज ही अपनी ज़हन में बैठा लें कि Islam Shari'at Se Hai Tabiyat Se Nahi क्यूंकि दीन मुकम्मल है। दुनियावी क़ानून बदलता रहता है लेकिन अल्लाह का बनाया क़ानून कभी नहीं बदलता है।
आज हमें अपने आप से यह सवाल करना चाहिए:
क्या मेरा दीन कुरआन और सुन्नत से चलता है या मेरी तबीयत से?
क्योंकि तबीयत बदलती रहती है।
आज जो अच्छा लगता है, कल वही अच्छा न लगे।
आज जिस बात को सही समझते हैं, कल अपनी सोच बदल सकती है।
लेकिन अल्लाह की शरीयत इंसान की बदलती हुई पसंद की मोहताज नहीं।
इसलिए जब कुरआन और सहीह सुन्नत से कोई बात स्पष्ट रूप से साबित हो जाए, तो एक मोमिन का रवैया यह होना चाहिए:
“समी'ना व अत'ना — हमने सुना और हमने मान लिया।”
यही बंदगी है।
यही आज्ञाकारिता है।
यही ईमान का तकाज़ा है।
इस्लाम अपनी तबीयत के पीछे चलने का नाम नहीं, बल्कि अपनी तबीयत को अल्लाह की शरीयत के मुताबिक ढालने का नाम है।
FAQs – Islam Shariyat Se Hai Tabiyat Se Nahi
1. Islam Shariyat Se Hai Tabiyat Se Nahi ka kya matlab hai?
इसका मतलब है कि मुसलमान अपनी पसंद, नापसंद और तबीयत को दीन का पैमाना नहीं बनाता। जब कुरआन और सहीह सुन्नत से कोई हुक्म साबित हो जाए तो उसे अल्लाह और उसके रसूल ﷺ के आदेश के मुताबिक मानना चाहिए।
2. Kya Islam mein apni pasand ki koi ahmiyat nahi?
जायज़ दुनियावी मामलों में इंसान अपनी पसंद रख सकता है। लेकिन जब किसी मामले में अल्लाह और उसके रसूल ﷺ का स्पष्ट हुक्म मौजूद हो, तो व्यक्तिगत पसंद को उस हुक्म से ऊपर नहीं रखा जा सकता।
3. Quran mein Allah aur Rasool ﷺ ki itaat ke bare mein kya kaha gaya hai?
अल्लाह तआला फरमाता है कि जो व्यक्ति अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करे, उसने बड़ी सफलता प्राप्त की। (सूरह अल-अहज़ाब 33:71)
4. Agar Shariyat ka koi hukm meri tabiyat ke khilaf ho to kya karna chahiye?
अगर हुक्म सहीह दलील से साबित है, तो अपनी तबीयत को शरीयत के मुताबिक ढालने की कोशिश करनी चाहिए। अल्लाह फरमाता है कि हो सकता है कोई चीज हमें नापसंद हो जबकि उसमें हमारे लिए भलाई हो। (सूरह अल-बक़रह 2:216)
5. Kya Islam mein har cheez apni marzi se ki ja sakti hai?
नहीं। जायज़ मामलों में इंसान को विकल्प दिया गया है, लेकिन इबादत और हलाल-हराम के मामलों में कुरआन और सहीह सुन्नत को आधार बनाना जरूरी है।
6. Kya logon ka riwaj Shariyat ki daleel ho sakta hai?
सिर्फ किसी काम का समाज या परिवार में प्रचलित होना उसे शरीयत का हुक्म नहीं बना देता। दीन के मामलों में कुरआन और सहीह सुन्नत से दलील जरूरी है।
7. Islam mein Sunnat ki pairvi kyun zaroori hai?
क्योंकि रसूलुल्लाह ﷺ हमारे लिए दीन का व्यावहारिक नमूना हैं। अल्लाह तआला ने फरमाया: “जो रसूल की आज्ञा माने, उसने वास्तव में अल्लाह की आज्ञा मानी।” (सूरह अन-निसा 4:80)
8. Musalman ka Shariyat ke hukm par kya rawayya hona chahiye?
एक मोमिन का रवैया “समी'ना व अत'ना” यानी “हमने सुना और हमने मान लिया” होना चाहिए। (सूरह अन-नूर 24:51)

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