अल्लाह तआला ने इंसानों की हिदायत और गुमरही से बचाने के लिए तकरीबन एक लाख 24 हज़ार पैगंबर भेजे। ताकि इंसानों को अंधेरों से निकाल कर रोशनी की तरफ़ लाए। और ऐसा नहीं की सभी को एक साथ भेजा। बल्कि अल्लाह तआला ने इंसानों की हिदायत और उन्हें गुमराही से बचाने के लिए अलग-अलग ज़मानों में बहुत से नबी और रसूल भेजे। उनकी क़ौमें अलग थीं, ज़माने अलग थे और हालात भी अलग थे, लेकिन Sabhi Nabiyon Ka Ek Hi Paigham था:
“ला इलाहा इल्लल्लाह” — अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं।
हज़रत नूह अलैहिस्सलाम से लेकर आख़िरी नबी हज़रत मुहम्मद ﷺ तक तमाम अंबिया ने अपनी-अपनी क़ौमों को तौहीद, यानी सिर्फ़ एक अल्लाह की इबादत और उसके साथ किसी को शरीक न करने की दावत दी।
क़ुरआन मजीद में अल्लाह तआला फ़रमाता है:
“और हमने हर उम्मत में एक रसूल भेजा कि अल्लाह की इबादत करो और ताग़ूत से बचो।”
(सूरह अन-नहल 16:36)
यानी Sabhi Nabiyon Ka Ek Hi Paigham था और वह था—अल्लाह की इबादत, तौहीद की पैरवी और शिर्क से बचना।
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| Allah ki ibadat karo, Tauheed ko apnao aur shirk se bacho. |
लेकिन सवाल यह है कि जब Sabhi Nabiyon Ka Ek Hi Paigham रहा, तो फिर इंसान गुमराह क्यों हो गया? तौहीद के इस साफ़ पैग़ाम के बावजूद शिर्क और गुमराही की शुरुआत कैसे हुई?
आइए, क़ुरआन और सहीह हदीस की रोशनी में इस अहम सवाल को आसान ज़ुबान में समझते हैं।
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सभी नबियों का पैग़ाम एक ही था
अल्लाह तआला फ़रमाता है:
और हमने तुमसे पहले कोई रसूल नहीं भेजा, मगर उसकी तरफ़ यही वही करते रहे कि मेरे सिवा कोई माबूद नहीं, इसलिए मेरी ही इबादत करो।"
(सूरह अल-अंबिया 21:25)
इस आयत से साफ़ पता चलता है कि तमाम नबियों की सबसे पहली और सबसे अहम दावत तौहीद थी।
यानी:
ला इलाहा इल्लल्लाह — अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं।
हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) की दावत
हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) ने अपनी क़ौम को बहुत लंबे समय तक अल्लाह की तरफ़ बुलाया।
उन्होंने कहा:
"ऐ मेरी क़ौम! अल्लाह की इबादत करो, उसके सिवा तुम्हारा कोई माबूद नहीं।"
(सूरह अल-आराफ़ 7:59)
लेकिन उनकी क़ौम के बहुत से लोगों ने उनकी दावत को नहीं माना और अपने बनाए हुए माबूदों को नहीं छोड़ा।
हज़रत हूद (अलैहिस्सलाम) की दावत
हज़रत हूद (अलैहिस्सलाम) ने भी अपनी क़ौम को यही पैग़ाम दिया:
"अल्लाह की इबादत करो, उसके सिवा तुम्हारा कोई माबूद नहीं।"
(सूरह अल-आराफ़ 7:65)
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हज़रत सालेह (अलैहिस्सलाम) की दावत
हज़रत सालेह (अलैहिस्सलाम) ने भी अपनी क़ौम को तौहीद की तरफ़ बुलाया:
"अल्लाह की इबादत करो, उसके सिवा तुम्हारा कोई माबूद नहीं।"
(सूरह अल-आराफ़ 7:73)
हज़रत शुऐब (अलैहिस्सलाम) की दावत
हज़रत शुऐब (अलैहिस्सलाम) ने भी अपनी क़ौम को यही समझाया:
"अल्लाह की इबादत करो, उसके सिवा तुम्हारा कोई माबूद नहीं।"
(सूरह अल-आराफ़ 7:85)
इससे मालूम हुआ कि नबियों की दावत का सबसे पहला मक़सद इंसान को एक अल्लाह की इबादत की तरफ़ लाना था।
हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) और तौहीद
हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने भी अपनी क़ौम को अल्लाह की इबादत की तरफ़ बुलाया और बुतों की पूजा का इनकार किया।
उन्होंने अपनी क़ौम से साफ़ कहा कि जिन चीज़ों की तुम पूजा करते हो, वे न तुम्हें फ़ायदा दे सकती हैं और न नुक़सान।
क़ुरआन में हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) की दावत और उनकी तौहीद की सोच को कई जगह बयान किया गया है।
हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) की दावत
हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) को भी अल्लाह ने अपनी इबादत की दावत देने के लिए भेजा।
अल्लाह तआला ने फ़रमाया:
"बेशक मैं ही अल्लाह हूँ, मेरे सिवा कोई माबूद नहीं, इसलिए मेरी इबादत करो।"
(सूरह ताहा 20:14)
यानी हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) की दावत भी वही थी जो दूसरे नबियों की थी।
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हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) की दावत
हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) ने भी अपनी क़ौम को सिर्फ़ अल्लाह की इबादत की तरफ़ बुलाया।
अल्लाह तआला फ़रमाता है:
"बेशक अल्लाह ही मेरा रब है और तुम्हारा भी रब है, इसलिए उसी की इबादत करो। यही सीधा रास्ता है।"(सूरह आले-इमरान 3:51)
इसलिए यह कहना बिल्कुल सही है कि सभी नबियों की बुनियादी दावत तौहीद थी।
हज़रत मुहम्मद ﷺ की दावत
जब आख़िरी नबी हज़रत मुहम्मद ﷺ मक्का में तशरीफ़ लाए तो आपने भी सबसे पहले लोगों को तौहीद की दावत दी।
आप ﷺ ने लोगों को बताया कि अल्लाह के सिवा किसी की इबादत न करो और उसके साथ किसी को शरीक न ठहराओ।
क़ुरआन में अल्लाह तआला फ़रमाता है:
"कह दीजिए: ऐ अहले किताब! ऐसी बात की तरफ़ आओ जो हमारे और तुम्हारे बीच बराबर है: यह कि हम अल्लाह के सिवा किसी की इबादत न करें और उसके साथ किसी को शरीक न करें।"(सूरह आले-इमरान 3:64)
फिर इंसान गुमराह क्यों हो जाता है?
यह बहुत अहम सवाल है।
अगर नबियों ने रास्ता साफ़-साफ़ बता दिया था, तो इंसान उस रास्ते से हट क्यों जाता है?
इसके कई कारण हैं।
1. बाप-दादा की अंधी पैरवी
कई लोग दलील देखने के बजाय सिर्फ़ यह देखते हैं कि उनके बाप-दादा क्या करते आए हैं।
क़ुरआन में ऐसे लोगों का ज़िक्र करते हुए अल्लाह तआला फ़रमाता है:
"हमने अपने बाप-दादा को एक तरीके पर पाया है और हम उन्हीं के नक़्शे-क़दम पर चल रहे हैं।"
(सूरह अज़-ज़ुख़रुफ़ 43:23)
इसलिए सिर्फ़ पुरानी रस्म होना किसी काम के सही होने की दलील नहीं है।
2. शैतान का धोखा
इंसान का एक बड़ा दुश्मन शैतान है।
अल्लाह तआला फ़रमाता है:
"बेशक शैतान तुम्हारा खुला दुश्मन है।"
(सूरह फ़ातिर 35:6)
शैतान इंसान को धीरे-धीरे गुमराह करता है। वह कभी गुनाह को अच्छा दिखाता है और कभी गलत काम को दीन का हिस्सा समझाने की कोशिश करता है।
इसलिए मुसलमान को हर काम के लिए क़ुरआन और सही सुन्नत से रहनुमाई लेनी चाहिए।
3. दुनिया की मोहब्बत
जब इंसान के दिल में दुनिया की मोहब्बत बहुत बढ़ जाती है तो वह आख़िरत को भूलने लगता है।
फिर इंसान यह सोचने लगता है कि लोग क्या कहेंगे, समाज क्या कहेगा और दुनिया में मुझे क्या फ़ायदा मिलेगा।
लेकिन असल कामयाबी दुनिया की नहीं बल्कि आख़िरत की कामयाबी है।
4. क़ुरआन और सुन्नत से दूरी
इंसान जब अल्लाह की किताब और रसूल ﷺ की सही सुन्नत से दूर हो जाता है तो उसके लिए सही और गलत में फर्क करना मुश्किल हो जाता है।
रसूलुल्लाह ﷺ ने अपनी सुन्नत को मज़बूती से पकड़ने की ताकीद फ़रमाई।
आप ﷺ ने फ़रमाया:
"तुम पर मेरी सुन्नत और मेरे बाद हिदायत पाए हुए ख़ुलफ़ा-ए-राशिदीन की सुन्नत को लाज़िम पकड़ना है। उसे मज़बूती से थामे रहना।"
(सुनन अबी दाऊद 4607, जामे तिर्मिज़ी 2676)
इसलिए दीन को समझने के लिए क़ुरआन और सही सुन्नत को आधार बनाना चाहिए।
तौहीद ही असल कामयाबी है
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
"अल्लाह का बंदों पर हक़ यह है कि वे सिर्फ़ उसी की इबादत करें और उसके साथ किसी को शरीक न करें।"
(सहीह बुख़ारी 2856, सहीह मुस्लिम 30)
इस हदीस से पता चलता है कि इंसान पर सबसे बड़ा हक़ अल्लाह का है और वह यह है कि उसकी इबादत की जाए और उसके साथ किसी को शरीक न किया जाए।
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सिर्फ़ ज़ुबान से कलिमा पढ़ना या उसके मुताबिक़ ज़िंदगी गुज़ारना?
ला इलाहा इल्लल्लाह सिर्फ़ ज़ुबान से कह देने का नाम नहीं, बल्कि इसका मतलब समझना और इसके मुताबिक़ ज़िंदगी गुज़ारना भी ज़रूरी है।
इसका मतलब है:
- अल्लाह को अकेला माबूद मानना।
- सिर्फ़ उसी की इबादत करना।
- उसके साथ किसी को शरीक न करना।
- हर इबादत उसी के लिए करना।
- रसूलुल्लाह ﷺ की सही सुन्नत की पैरवी करना।
- शिर्क और गुमराही से बचना।
हमें क्या करना चाहिए?
अगर हम गुमराही से बचना चाहते हैं तो हमें:
क़ुरआन पढ़ना चाहिए, सही हदीस सीखनी चाहिए, तौहीद को समझना चाहिए, शिर्क से बचना चाहिए और रसूलुल्लाह ﷺ की सही सुन्नत पर चलने की कोशिश करनी चाहिए।
सिर्फ़ यह कहना कि "हम मुसलमान हैं" काफी नहीं, बल्कि हमारे आमाल और हमारा अकीदा भी इस्लाम के मुताबिक़ होना चाहिए।
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नतीजा
तमाम नबियों की बुनियादी दावत एक ही थी:
ला इलाहा इल्लल्लाह
हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम), हज़रत हूद (अलैहिस्सलाम), हज़रत सालेह (अलैहिस्सलाम), हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम), हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम), हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) और आख़िरी नबी हज़रत मुहम्मद ﷺ — सभी ने इंसान को अल्लाह की इबादत और तौहीद की तरफ़ बुलाया।
फिर भी इंसान अपनी ख्वाहिश, अंधी पैरवी, शैतान के धोखे और दीन से दूरी की वजह से गुमराह होता रहा।
इसलिए हमें चाहिए कि हम नबियों की इस बुनियादी दावत को समझें और अपनी ज़िंदगी में अपनाएं।
🤲 अल्लाह हमें सच्ची तौहीद पर क़ायम रखे, शिर्क और हर तरह की गुमराही से बचाए और क़ुरआन व सही सुन्नत पर चलने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
1. क्या सभी नबियों की दावत एक ही थी?
जी हाँ। क़ुरआन के मुताबिक़ सभी नबियों की बुनियादी दावत एक ही थी—सिर्फ़ अल्लाह की इबादत करना और उसके साथ किसी को शरीक न करना। (सूरह अन-नहल 16:36, सूरह अल-अंबिया 21:25)
2. ला इलाहा इल्लल्लाह का मतलब क्या है?
ला इलाहा इल्लल्लाह का मतलब है कि अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं। इंसान को हर तरह की इबादत सिर्फ़ अल्लाह के लिए करनी चाहिए।
3. सभी नबियों की दावत एक थी तो इंसान गुमराह क्यों हुआ?
इंसान बाप-दादा की अंधी पैरवी, शैतान के धोखे, दुनिया की मोहब्बत और क़ुरआन व सही सुन्नत से दूरी की वजह से गुमराह होता रहा।
4. क्या हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) ने भी तौहीद की दावत दी?
जी हाँ। हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) ने अपनी क़ौम से कहा कि अल्लाह की इबादत करो, उसके सिवा तुम्हारा कोई माबूद नहीं। (सूरह अल-आराफ़ 7:59)
5. क्या हज़रत मूसा और हज़रत ईसा (अलैहिमस्सलाम) ने भी तौहीद की दावत दी?
जी हाँ। हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) को अल्लाह ने फ़रमाया कि मेरे सिवा कोई माबूद नहीं, इसलिए मेरी इबादत करो। (सूरह ताहा 20:14) हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) ने भी अपनी क़ौम को सिर्फ़ अल्लाह की इबादत का हुक्म दिया। (सूरह आले-इमरान 3:51)
6. क्या सिर्फ़ ज़ुबान से ला इलाहा इल्लल्लाह कहना काफी है?
नहीं। कलिमा पढ़ने के साथ उसके मतलब को मानना और उसके मुताबिक़ ज़िंदगी गुज़ारना भी ज़रूरी है। यानी सिर्फ़ अल्लाह की इबादत करना और उसके साथ किसी को शरीक न करना।
7. गुमराही से बचने के लिए क्या करना चाहिए?
क़ुरआन को समझकर पढ़ना, सही हदीस सीखना, तौहीद को समझना, शिर्क से बचना और रसूलुल्लाह ﷺ की सही सुन्नत पर अमल करना चाहिए।
8. क्या तौहीद इंसान की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी है?
जी हाँ। रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया कि अल्लाह का बंदों पर हक़ यह है कि वे सिर्फ़ उसी की इबादत करें और उसके साथ किसी को शरीक न करें। (सहीह बुख़ारी 2856, सहीह मुस्लिम 30)

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