क्या आपने कभी अपने आप से यह सवाल किया है कि मैं इस दुनिया में क्यों आया हूँ?Allah Ne Hame Kyun Paida kiya? आख़िर क्या है हमारी पैदाइश का असली मक़सद?
मैं पैदा हुआ, बड़ा हुआ, पढ़ाई की, नौकरी या कारोबार किया, घर बनाया, शादी की, बच्चे पैदा किए, अपनी ज़रूरतें पूरी कीं और एक दिन इस दुनिया से चला गया—तो क्या इंसानी ज़िंदगी बस इतनी ही है?
अगर इंसान की ज़िंदगी का मकसद केवल खाना, पीना, कमाना, शादी करना, बच्चे पैदा करना और दुनिया की सुख-सुविधाएं हासिल करना होता, तो फिर इंसान और दूसरे जीवों में असली फर्क क्या रहता?
क़ुरआन इंसान को उसकी ज़िंदगी का असली मकसद बताता है। अल्लाह तआला ने फ़रमाया:
"और मैंने जिन्न और इंसानों को सिर्फ इसलिए पैदा किया है कि वे मेरी इबादत करें।"
(सूरह अज़-ज़ारियात 51:56)
यह आयत इंसान की पूरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा सवाल हल कर देती है।
✍️ By: Mohib Tahiri | 🕋 Islamic blog | Insani paidaish ka Maqsad|Aakhirat ki fikar|Aakhirat ki Taiyari|🕰 Updated:14 Aug 2026
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| Hamari paidaish ka Asal maqsad |
लेकिन यहां इबादत का मतलब केवल नमाज़, रोज़ा और मस्जिद तक सीमित नहीं है। इबादत का व्यापक अर्थ है—अल्लाह को अपना रब मानना, उसकी आज्ञा के अनुसार ज़िंदगी गुज़ारना, उसके बताए हुए हलाल-हराम की पाबंदी करना और अपनी पूरी ज़िंदगी उसकी रज़ामंदी हासिल करने के लिए लगाना।
इस आर्टिकल Allah Ne hame Kyun Paida kiya? में हम क़ुरआन और सही हदीस की रोशनी में पढ़ेंगे की आखिरी हमारी पैदाइश का असल मक़सद क्या है।
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1. हम इस दुनिया में अपनी मर्ज़ी से नहीं आए
इंसान ने खुद यह फैसला नहीं किया था कि उसे पैदा होना है।
न उसने अपने माता-पिता चुने, न अपनी शक्ल, न अपना रंग, न अपनी जन्मभूमि और न ही अपनी ज़िंदगी की शुरुआत का समय।
फिर भी इंसान अक्सर ऐसा व्यवहार करता है जैसे वह अपनी ज़िंदगी का पूरी तरह मालिक हो।
क़ुरआन हमें याद दिलाता है कि हमारा अस्तित्व अल्लाह की देन है।
अल्लाह तआला फ़रमाता है:
"क्या इंसान को याद नहीं कि हमने उसे पहले पैदा किया, जबकि वह कुछ भी नहीं था?"
(सूरह मरयम 19:67)
- जिस इंसान का अपना कोई अस्तित्व नहीं था, अल्लाह ने उसे अस्तित्व दिया।
- जिसे बोलना नहीं आता था, उसे बोलने की शक्ति दी।
- जिसे चलना नहीं आता था, उसे चलना सिखाया।
- जिसे कुछ मालूम नहीं था, उसे ज्ञान दिया।
इसलिए इंसान को यह नहीं भूलना चाहिए कि जिसने उसे पैदा किया है, उसी के सामने उसे एक दिन लौटकर जाना है।
2. इंसान को दुनिया में बेकार नहीं भेजा गया
कभी-कभी इंसान सोचता है:
"हम पैदा हुए, कुछ साल जिए और मर गए—आखिर इसका फायदा क्या है?"
क़ुरआन इस सोच को गलत ठहराता है।
अल्लाह तआला फ़रमाता है:
"क्या तुमने यह समझ रखा था कि हमने तुम्हें बेकार पैदा किया है और तुम हमारी तरफ लौटाए नहीं जाओगे?"
(सूरह अल-मुमिनून 23:115)
यह बहुत गंभीर सवाल है।
अल्लाह कह रहा है कि इंसान को बेकार और बिना उद्देश्य पैदा नहीं किया गया।
- हमारी ज़िंदगी का उद्देश्य है।
- हमारी हर सांस की कीमत है।
- हमारे हर अच्छे काम का हिसाब है।
- हमारे हर बुरे काम का भी हिसाब है।
- और हमारी ज़िंदगी का अंतिम पड़ाव अल्लाह की तरफ लौटना है।
3. इंसान की सबसे बड़ी मंज़िल दुनिया नहीं, आख़िरत है
दुनिया कितनी भी खूबसूरत क्यों न हो, यह हमेशा रहने की जगह नहीं है।
क़ुरआन कहता है:
"हर जान को मौत का स्वाद चखना है।"
(सूरह आले-इमरान 3:185)
कोई कितना भी अमीर हो, कितना भी ताकतवर हो, कितना भी मशहूर हो—मौत से बच नहीं सकता।
- महल में रहने वाला भी जाएगा।
- झोपड़ी में रहने वाला भी जाएगा।
- बादशाह भी जाएगा।
- गरीब भी जाएगा।
- युवा भी जाएगा।
- बूढ़ा भी जाएगा।
इसलिए समझदार इंसान केवल यह नहीं सोचता कि:
♦️"मुझे दुनिया में क्या हासिल करना है?"
बल्कि वह यह भी सोचता है:
♦️"मुझे आख़िरत के लिए क्या लेकर जाना है?"
👉 Shirk gumrahi aur aakhirat ki Tabahi ka Sabab kyun hai Janne ke liye zarur padhen is article ko
4. दुनिया असल में एक इम्तिहान है
अल्लाह तआला फ़रमाता है:
"जिसने मौत और ज़िंदगी को पैदा किया ताकि तुम्हें आज़माए कि तुममें से कौन अमल में सबसे अच्छा है।"
(सूरह अल-मुल्क 67:2)
गौर कीजिए—
- अल्लाह ने यह नहीं कहा कि कौन सबसे ज्यादा अमीर है।
- यह नहीं कहा कि कौन सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है।
- यह नहीं कहा कि किसके पास सबसे बड़ा घर है।
बल्कि पूछा जाएगा कि किसके अमल सबसे अच्छे हैं।
यही दुनिया की असली परीक्षा है।
- किसी को धन देकर आज़माया जाता है।
- किसी को गरीबी देकर।
- किसी को स्वास्थ्य देकर।
- किसी को बीमारी के माध्यम से।
- किसी को ताकत देकर।
- किसी को कमजोरी देकर।
- किसी को आसानी देकर।
- किसी को मुश्किल हालात में डालकर।
इसलिए किसी के पास ज्यादा और किसी के पास कम होना अपने आप में कामयाबी या नाकामी की निशानी नहीं।
असल कामयाबी यह है कि इंसान अपने हालात में अल्लाह को कितना राज़ी करता है।
5. इबादत का मतलब सिर्फ नमाज़ नहीं
जब अल्लाह ने कहा:
"मैंने जिन्न और इंसानों को केवल अपनी इबादत के लिए पैदा किया।"
(अज़-ज़ारियात 51:56)
तो इसका अर्थ केवल मस्जिद में जाकर नमाज़ पढ़ना नहीं है।
- नमाज़ इबादत है।
- रोज़ा इबादत है।
- ज़कात इबादत है।
- हज इबादत है।
- क़ुरआन पढ़ना इबादत है।
- अल्लाह का ज़िक्र इबादत हैv।
लेकिन अगर कोई व्यक्ति हलाल रोज़ी कमाता है और अपने परिवार पर खर्च करता है, तो यह भी नेक नीयत के साथ इबादत बन सकता है।
- माता-पिता के साथ अच्छा व्यवहार करना इबादत है।
- पड़ोसी के साथ अच्छा व्यवहार करना इबादत है।
- किसी भूखे को खाना खिलाना इबादत है।
- किसी मजबूर की मदद करना इबादत है।
- किसी पर ज़ुल्म न करना भी अल्लाह की आज्ञा का पालन है।
लेकिन इन सबका मूल आधार यह है कि इंसान अल्लाह की रज़ामंदी के लिए काम करे और शरीयत की सीमाओं का पालन करे।
6. अल्लाह को हमारी इबादत की जरूरत नहीं
यह बात समझना बहुत जरूरी है।
👉 अल्लाह ने हमें अपनी इबादत के लिए पैदा किया है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि अल्लाह हमारी इबादत का मोहताज है।
अल्लाह बेनियाज़ है।
- हम नमाज़ पढ़ें या न पढ़ें, अल्लाह की बादशाहत में कोई कमी नहीं आती।
- हम रोज़ा रखें या न रखें, अल्लाह की ताकत में कोई कमी नहीं आती।
फायदा हमें ही मिलता है।
क़ुरआन में अल्लाह तआला फ़रमाता है:
"ऐ लोगों! तुम अल्लाह के मोहताज हो और अल्लाह बेनियाज़, प्रशंसित है।"
(सूरह फ़ातिर 35:15)
💠 इसलिए इबादत अल्लाह की जरूरत नहीं बल्कि हमारी जरूरत है।
7. फिर इंसान को अक्ल और आज़ादी क्यों दी गई?
अगर इंसान को केवल पैदा करके मजबूर कर दिया जाता कि वह जो चाहे नहीं कर सकता, तो परीक्षा का अर्थ ही खत्म हो जाता।
- अल्लाह ने इंसान को समझने की क्षमता दी।
- अच्छे और बुरे का रास्ता बताया।
- पैगंबर भेजे।
- किताबें उतारीं।
- फिर इंसान को चुनाव की क्षमता दी।
अल्लाह तआला फ़रमाता है:
"हमने उसे रास्ता दिखा दिया, अब चाहे वह शुक्र करने वाला बने और चाहे नाशुक्रा।"
(सूरह अल-इंसान 76:3)
यही कारण है कि इंसान के सामने दो रास्ते हैं:
- 1. अल्लाह की आज्ञा का रास्ता
- या
- 2. अपनी इच्छाओं के पीछे चलने का रास्ता।
लेकिन चुनाव के साथ जिम्मेदारी भी आती है।
8. शैतान इंसान को उसके असली मकसद से दूर करता है
इंसान का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि वह दुनिया में इतना व्यस्त हो जाए कि अपने पैदा किए जाने का मकसद ही भूल जाए।
शैतान चाहता है कि इंसान कहे:
"अभी बहुत उम्र पड़ी है।"
फिर वही इंसान कहता है:
"बुढ़ापे में इबादत कर लेंगे।"
लेकिन मौत उम्र देखकर नहीं आती।
किसी को बुढ़ापा मिलता है और किसी को जवानी में ही बुला लिया जाता है।
इसलिए तौबा और नेक अमल को भविष्य के लिए टालना बहुत बड़ी भूल है।
9. दुनिया छोड़ना नहीं, दुनिया को सही तरीके से जीना है
इसका मतलब यह नहीं कि इस्लाम इंसान को दुनिया छोड़ने का आदेश देता है।
- इस्लाम मेहनत करने से नहीं रोकता।
- कारोबार करने से नहीं रोकता।
- घर बनाने से नहीं रोकता।
- अच्छे कपड़े पहनने से नहीं रोकता।
- हलाल तरीके से धन कमाने से नहीं रोकता।
बल्कि समस्या तब पैदा होती है जब दुनिया इंसान के हाथ में रहने के बजाय उसके दिल में बैठ जाती है।
- मुसलमान दुनिया में रहे, लेकिन दुनिया का गुलाम न बने।
- धन कमाए, लेकिन धन उसे अल्लाह से दूर न करे।
- व्यापार करे, लेकिन हराम से बचे।
- परिवार से प्यार करे, लेकिन अल्लाह की आज्ञा को न भूले।
यही संतुलित जीवन है।
10. हमें दुनिया में क्यों भेजा गया? एक आसान जवाब
अगर इस पूरे विषय को बहुत आसान शब्दों में समझें तो जवाब यह है:
- हम दुनिया में खाने-पीने और मौज-मस्ती के लिए नहीं आए।
- हम केवल पैसा कमाने के लिए नहीं आए।
- हम केवल घर बनाने और परिवार बढ़ाने के लिए नहीं आए।
- हम केवल प्रसिद्ध होने के लिए नहीं आए।
हम यहां इसलिए आए हैं कि:
- अपने पैदा करने वाले अल्लाह को पहचानें।
- केवल उसी की इबादत करें।
- उसके आदेशों का पालन करें।
- उसके रसूल ﷺ की पैरवी करें।
- हलाल और हराम में फर्क करें।
- इंसाफ करें।
- ज़ुल्म से बचें।
- लोगों के हक़ अदा करें।
- अपने आपको गुनाहों से बचाएं।
- अच्छे अमल करें।
- बुरे कामों से तौबा करें।
- और आख़िरत की तैयारी करें।
11. एक दिन यह परीक्षा खत्म हो जाएगी
दुनिया की ज़िंदगी हमेशा नहीं चलेगी।
जिस दिन मौत आएगी, उस दिन हमारा पैसा, पद, मोबाइल, मकान, गाड़ी और दुनिया की प्रसिद्धि हमारे साथ नहीं जाएगी।
हमारे साथ जाएंगे तो हमारे कर्म।
नबी ﷺ ने बताया कि
जब इंसान मर जाता है तो उसके कर्मों का सिलसिला समाप्त हो जाता है, सिवाय कुछ ऐसे कार्यों के जिनका लाभ मृत्यु के बाद भी जारी रहता है—जैसे सदक़ा-ए-जारीया, लाभ देने वाला ज्ञान और नेक संतान जो उसके लिए दुआ करे।
(सहीह मुस्लिम)
इसलिए बुद्धिमान इंसान केवल ऐसी चीजें जमा नहीं करता जो मौत के साथ पीछे छूट जाएंगी।
वह ऐसी पूंजी भी जमा करता है जो आख़िरत में काम आए।
12. असली कामयाब इंसान कौन है?
दुनिया की नजर में कामयाबी का मतलब हो सकता है:
बड़ा घर + बड़ी गाड़ी + ज्यादा पैसा + प्रसिद्धि।
लेकिन क़ुरआन की नजर में असली कामयाबी इससे कहीं बड़ी है।
अल्लाह तआला फ़रमाता है:
"जो व्यक्ति आग से बचा लिया गया और जन्नत में दाखिल कर दिया गया, वही सफल हुआ।"(सूरह आले-इमरान 3:185)
इस एक आयत से कामयाबी की पूरी परिभाषा बदल जाती है।
अगर किसी के पास दुनिया की सारी चीजें हों लेकिन आख़िरत खराब हो गई, तो उसने वास्तव में क्या हासिल किया?
और अगर किसी ने दुनिया में मेहनत की, हलाल कमाया, अल्लाह की इबादत की, लोगों के हक़ अदा किए और अल्लाह की रहमत से जन्नत पा ली—तो वही वास्तविक सफल व्यक्ति है।
13. अपने आप से आज ये पांच सवाल पूछिए
आज कुछ मिनट अकेले बैठकर अपने आप से पूछिए:
1. मैं किसके लिए जी रहा हूँ?
2. मेरी ज़िंदगी में अल्लाह की कितनी जगह है?
3. अगर आज मेरी मौत आ जाए तो क्या मैं तैयार हूँ?
4. मेरे पास दुनिया की तैयारी ज्यादा है या आख़िरत की?
5. अगर मुझे आज अल्लाह के सामने खड़ा होना पड़े तो मैं क्या लेकर जाऊंगा?
इन सवालों के जवाब इंसान की पूरी ज़िंदगी बदल सकते हैं।
14. सबसे बड़ा धोखा क्या है?
सबसे बड़ा धोखा यह नहीं कि इंसान गरीब है।
सबसे बड़ा धोखा यह है कि इंसान दुनिया में इतना खो जाए कि उसे याद ही न रहे कि उसे एक दिन दुनिया से जाना है।
- वह भविष्य के लिए घर बनाता रहता है, लेकिन कब्र के लिए कुछ नहीं भेजता।
- बच्चों के भविष्य की चिंता करता है, लेकिन अपने आख़िरत के भविष्य की चिंता नहीं करता।
- बैंक बैलेंस देखता है, लेकिन अपने अमल का हिसाब नहीं देखता।
- अपने शरीर की सफाई करता है, लेकिन अपने दिल की सफाई भूल जाता है।
- दुनिया की परीक्षा में पास होने के लिए सालों मेहनत करता है, लेकिन आख़िरत की परीक्षा की तैयारी को टालता रहता है।
यही इंसान की सबसे बड़ी भूल है।
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15. इंसानी ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत मकसद
अल्लाह ने इंसान को केवल इसलिए नहीं बनाया कि वह सांस लेता रहे।
बल्कि उसे ऐसा जीवन दिया जिसमें वह अपने रब को पहचान सके, उसके सामने झुक सके, उसके आदेशों का पालन कर सके और अपनी आख़िरत को संवार सके।
और यही इंसान की सबसे बड़ी इज़्ज़त है कि उसे अपने रब की पहचान और उसकी इबादत का रास्ता दिया गया।
इसलिए जब कभी दिल में यह सवाल आए:
"मैं दुनिया में क्यों आया हूँ?"
तो जवाब याद रखिए:
मैं अपने रब को पहचानने, उसकी इबादत करने, उसकी आज्ञा के अनुसार जीवन बिताने और आख़िरत की कामयाबी हासिल करने के लिए इस दुनिया में आया हूँ।
Conclusion: हम मुसाफिर हैं, दुनिया हमारी मंज़िल नहीं
Allah Ne Hame Kyun Paida kiya? इस हक़ीक़त को समझें और दुनियां में आने के मक़सद को पहचानें और रब को राज़ी करने में लग जाएं, ज़िंदगी का कोई भरोसा नहीं।
इंसान इस दुनिया में हमेशा रहने के लिए नहीं आया।
- हम सब एक सफर पर हैं।
- जन्म इस सफर की शुरुआत है।
- दुनिया उसका एक पड़ाव है।
- मौत अगले पड़ाव का दरवाज़ा है।
- और आख़िरत असली और हमेशा रहने वाली ज़िंदगी है।
इसलिए समझदार इंसान दुनिया को छोड़ता नहीं, बल्कि दुनिया को आख़िरत की खेती बना लेता है।
- वह कमाता है, लेकिन हलाल कमाता है।
- खाता है, लेकिन शुक्र करता है।
- परिवार पालता है, लेकिन अल्लाह को नहीं भूलता।
- लोगों से अच्छा व्यवहार करता है।
- गुनाह हो जाए तो तौबा करता है।
- नमाज़ कायम करता है।
- क़ुरआन से जुड़ता है।
हर दिन अपने आप से पूछता है:
"अगर आज मेरी ज़िंदगी का आखिरी दिन हो, तो क्या मैं अपने रब के सामने जाने के लिए तैयार हूँ?"
क्योंकि आखिरकार सवाल यह नहीं होगा कि हमने दुनिया में कितना जमा किया।
असल सवाल यह होगा कि हम अपने रब के पास क्या लेकर आए।
🤲Dua: अल्लाह हमें हमारी पैदाइश का असली मकसद समझने, अपनी ज़िंदगी को उसकी रज़ामंदी के मुताबिक गुज़ारने और ईमान व नेक अमल के साथ उसके पास लौटने की तौफ़ीक़ अता फरमाए। आमीन।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
1. अल्लाह ने इंसान को क्यों पैदा किया?
अल्लाह तआला ने इंसान और जिन्न को अपनी इबादत के लिए पैदा किया। क़ुरआन में है: “मैंने जिन्न और इंसानों को सिर्फ अपनी इबादत के लिए पैदा किया है।” (सूरह अज़-ज़ारियात 51:56)
2. क्या इंसान को केवल नमाज़ और रोज़े के लिए पैदा किया गया है?
नहीं। नमाज़, रोज़ा, ज़कात और हज इबादत के महत्वपूर्ण रूप हैं, लेकिन इबादत का अर्थ व्यापक है। अल्लाह की रज़ामंदी के लिए उसकी आज्ञा के अनुसार पूरी ज़िंदगी गुज़ारना भी इबादत है।
3. इंसानी ज़िंदगी का असली मकसद क्या है?
इंसानी ज़िंदगी का असली मकसद अल्लाह को पहचानना, उसकी इबादत करना, उसके आदेशों का पालन करना, नेक अमल करना और आख़िरत की कामयाबी हासिल करना है।
4. क्या इंसान को दुनिया में सिर्फ कमाने और खाने के लिए भेजा गया है?
नहीं। खाना, कमाना, परिवार की देखभाल और दुनिया के दूसरे जायज़ काम ज़िंदगी का हिस्सा हैं, लेकिन ये इंसान की अंतिम मंज़िल नहीं हैं। इंसान को दुनिया में आख़िरत की तैयारी के लिए भेजा गया है।
5. क्या दुनिया की ज़िंदगी एक इम्तिहान है?
जी हाँ। अल्लाह तआला ने मौत और ज़िंदगी को इसलिए पैदा किया कि इंसानों को आज़माए कि उनमें से कौन बेहतर अमल करता है। (सूरह अल-मुल्क 67:2)
6. क्या अल्लाह को हमारी इबादत की जरूरत है?
नहीं। अल्लाह बेनियाज़ है और उसे किसी की जरूरत नहीं। हमारी इबादत का लाभ हमें ही मिलता है। क़ुरआन में है कि इंसान अल्लाह का मोहताज है और अल्लाह बेनियाज़ है। (सूरह फ़ातिर 35:15)
7. इंसान को दुनिया में कितने समय के लिए रहना है?
किसी इंसान को अपनी मौत का निश्चित समय मालूम नहीं। इसलिए हर व्यक्ति को यह समझकर ज़िंदगी गुज़ारनी चाहिए कि उसे किसी भी समय अपने रब के पास लौटना पड़ सकता है।
8. मौत के बाद इंसान का क्या होगा?
इस्लामी शिक्षाओं के अनुसार मौत के बाद इंसान को दोबारा उठाया जाएगा और उसके कर्मों का हिसाब होगा। क़ुरआन बताता है कि हर व्यक्ति को उसके कर्मों का पूरा बदला दिया जाएगा। (सूरह आले-इमरान 3:185)
9. असली कामयाबी किसे कहते हैं?
क़ुरआन के अनुसार असली कामयाबी यह है कि इंसान जहन्नम से बचा लिया जाए और जन्नत में दाखिल कर दिया जाए। (सूरह आले-इमरान 3:185)
10. अगर इंसान अपने जीवन का मकसद भूल जाए तो क्या होता है?
जब इंसान अपने पैदा किए जाने का मकसद भूल जाता है तो वह अक्सर दुनिया की दौलत, इच्छाओं और मनोरंजन को ही अपनी मंज़िल समझने लगता है। इससे आख़िरत की तैयारी पीछे छूट जाती है।
11. क्या दुनिया की चीज़ें हासिल करना इस्लाम में गलत है?
नहीं। हलाल तरीके से धन कमाना, अच्छा घर रखना, परिवार की देखभाल करना और दुनिया की जायज़ सुविधाओं से लाभ उठाना गलत नहीं है। समस्या तब है जब दुनिया इंसान को अल्लाह की याद और आख़िरत की तैयारी से गाफिल कर दे।
12. हमें अपने जीवन का मकसद याद रखने के लिए क्या करना चाहिए?
क़ुरआन पढ़ना, नमाज़ कायम करना, अल्लाह का ज़िक्र करना, मौत और आख़िरत को याद रखना, नेक लोगों की संगत करना और अपने कर्मों का समय-समय पर जायज़ा लेना चाहिए।
13. क्या देर हो जाने के बाद भी इंसान तौबा कर सकता है?
जब तक इंसान की मौत नहीं आती, सच्ची तौबा का दरवाज़ा खुला है। इसलिए गुनाह के बाद मायूस होने के बजाय अल्लाह की तरफ लौटना चाहिए और अपनी ज़िंदगी को सुधारने की कोशिश करनी चाहिए।
14. इंसान को आज से क्या करना चाहिए?
सबसे पहले अपने ईमान और नमाज़ को सुधारना चाहिए, हराम से बचना चाहिए, लोगों के हक़ अदा करने चाहिए, गुनाहों से तौबा करनी चाहिए और अपनी ज़िंदगी को क़ुरआन व सुन्नत के मुताबिक ढालने की कोशिश करनी चाहिए।
15. इंसान की पैदाइश का मकसद एक वाक्य में क्या है?
इंसान को अपने रब की इबादत, उसकी आज्ञा के अनुसार जीवन बिताने, नेक अमल करने और आख़िरत की कामयाबी हासिल करने के लिए पैदा किया गया है।

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