बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
नबी करीम हज़रत मुहम्मद ﷺ पर दरूद व सलाम पढ़ना एक बहुत बड़ी नेकी और इबादत है। अल्लाह तआला ने क़ुरआन मजीद में खुद अपने नबी ﷺ पर दरूद भेजने का ज़िक्र फ़रमाया और ईमान वालों को भी दरूद व सलाम भेजने का हुक्म दिया।
दरूद शरीफ़ की सबसे बड़ी फ़ज़ीलतों में से एक यह है कि बंदा जब नबी करीम ﷺ पर एक बार दरूद भेजता है तो अल्लाह तआला उस पर दस रहमतें भेजता है। यह बात सहीह मुस्लिम की हदीस से साबित है।
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| Nabi ﷺ Par Salaat o Salam |
इस लेख "Nabi Kareem ﷺ Par Durood padhne ki fazilat"में हम दरूद शरीफ़ की फ़ज़ीलत को क़ुरआन और अहादीस की रोशनी में समझेंगे।
दरूद शरीफ़ क्या है?
दरूद या सलात-ओ-सलाम का मतलब नबी करीम ﷺ पर अल्लाह तआला से रहमत, बरकत और सलामती की दुआ करना है।
मिसाल के तौर पर हम कहते हैं:
اللهم صل على محمد وعلى آل محمد
या नमाज़ में पढ़ा जाने वाला मशहूर दरूद-ए-इब्राहीमी पढ़ते हैं।
दरूद शरीफ़ नबी करीम ﷺ से मुहब्बत का इज़हार भी है और आपकी ज़िंदगी व सुन्नत को याद करने का एक मुबारक ज़रिया भी है।
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क़ुरआन में दरूद पढ़ने का हुक्म
अल्लाह तआला फ़रमाता है:
إِنَّ اللَّهَ وَمَلَائِكَتَهُ يُصَلُّونَ عَلَى النَّبِيِّ ۚ يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا صَلُّوا عَلَيْهِ وَسَلِّمُوا تَسْلِيمًا
तर्जुमा:
“बेशक अल्लाह और उसके फ़रिश्ते नबी पर रहमत भेजते हैं। ऐ ईमान वालो! तुम भी उन पर दरूद और खूब सलाम भेजो।”
(सूरह अल-अहज़ाब, 33:56)
यह आयत दरूद की अज़मत को बयान करने के लिए काफ़ी है कि अल्लाह तआला ने पहले अपनी और फ़रिश्तों की तरफ़ से नबी ﷺ पर सलात का ज़िक्र किया और फिर ईमान वालों को भी दरूद व सलाम भेजने का हुक्म दिया।
एक बार दरूद पढ़ने पर दस रहमतें
दरूद शरीफ़ की सबसे स्पष्ट और बड़ी फ़ज़ीलत सहीह मुस्लिम की हदीस में आती है।
हज़रत अबू हुरैरा से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
مَنْ صَلَّى عَلَيَّ وَاحِدَةً صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ عَشْرًا
“जो व्यक्ति मुझ पर एक बार दरूद भेजता है, अल्लाह उस पर दस बार रहमत भेजता है।”
(सहीह मुस्लिम: 408)
ज़रा सोचिए!
एक बंदा अपनी ज़बान से नबी करीम ﷺ पर सिर्फ़ एक बार दरूद पढ़ता है और उसके बदले अल्लाह तआला उस बंदे पर दस रहमतें भेजता है।
इसलिए दरूद शरीफ़ ऐसा आसान अमल है जिसे इंसान चलते-फिरते, बैठे-बैठे और अपने रोज़मर्रा के कामों के दौरान भी पढ़ सकता है।
दरूद पढ़ने वाला क़यामत में नबी ﷺ के सबसे क़रीब होगा
दरूद शरीफ़ की एक और बड़ी फ़ज़ीलत जामे तिर्मिज़ी की हदीस में बयान हुई है।
हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
أَوْلَى النَّاسِ بِي يَوْمَ الْقِيَامَةِ أَكْثَرُهُمْ عَلَيَّ صَلَاةً
“क़यामत के दिन लोगों में मेरे सबसे क़रीब वह होगा जो मुझ पर सबसे ज़्यादा दरूद भेजता होगा।”
इमाम तिर्मिज़ी ने इस हदीस को हसन ग़रीब कहा है। (जामे तिर्मिज़ी: 484)
यह दरूद की कितनी बड़ी फ़ज़ीलत है कि क़यामत जैसे मुश्किल दिन में नबी करीम ﷺ के क़रीब होने का सौभाग्य उस व्यक्ति को मिलेगा जो दुनिया में आप ﷺ पर ज़्यादा दरूद भेजता था।
तमाम फ़िक्रों और ग़मों के लिए काफ़ी
जब रात का दो-तिहाई हिस्सा गुज़र जाता, तो रसूलुल्लाह ﷺ उठते और फ़रमाते:
“ऐ लोगो! अल्लाह को याद करो, अल्लाह को याद करो! खटखटाने वाली आ गई है और उसके साथ दूसरी भी आ लगी है। मौत अपनी फ़ौज लेकर आ गई है, मौत अपनी फ़ौज लेकर आ गई है।”मैंने अर्ज़ किया: “ऐ अल्लाह के रसूल ﷺ! मैं आप पर बहुत ज़्यादा दरूद पढ़ता हूँ, तो अपनी दुआ के समय में आपके ऊपर दरूद पढ़ने के लिए कितना समय मुक़र्रर कर लूँ?”
आपने ﷺ फ़रमाया:
“जितना तुम चाहो।”
मैंने अर्ज़ किया: “चौथाई हिस्सा?”
आपने ﷺ फ़रमाया: “जितना तुम चाहो। और अगर इससे ज़्यादा कर लो तो तुम्हारे लिए बेहतर है।”
मैंने अर्ज़ किया: “आधा?”
आपने ﷺ फ़रमाया: “जितना तुम चाहो। और अगर इससे ज़्यादा कर लो तो तुम्हारे लिए बेहतर है।”
मैंने अर्ज़ किया: “दो-तिहाई?”
आपने ﷺ फ़रमाया: “जितना तुम चाहो। और अगर इससे ज़्यादा कर लो तो तुम्हारे लिए बेहतर है।”
मैंने अर्ज़ किया: “अगर मैं अपनी दुआ के लिए रखा हुआ पूरा समय ही आप ﷺ पर दरूद पढ़ने में लगा दूँ?”
आपने ﷺ फ़रमाया:
“तब यह दरूद तुम्हारी तमाम फ़िक्रों और ग़मों के लिए काफ़ी होगा और तुम्हारे गुनाह माफ़ कर दिए जाएँगे।”
इमाम तिर्मिज़ी ने कहा: यह हदीस हसन सहीह है।
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अज़ान के बाद दरूद पढ़ने की सहीह हदीस
दरूद की फ़ज़ीलत सिर्फ़ आम तौर पर ही नहीं, बल्कि अज़ान के बाद भी हदीस में बयान हुई है।
हज़रत अब्दुल्लाह बिन अम्र से रिवायत है कि नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया:
जब तुम मुअज़्ज़िन की आवाज़ सुनो तो उसी तरह जवाब दो, फिर मुझ पर दरूद भेजो। क्योंकि जो व्यक्ति मुझ पर एक बार दरूद भेजता है, अल्लाह उस पर दस रहमतें भेजता है।
यह रिवायत सहीह मुस्लिम 384 में मौजूद है।
इससे हमें दो बातें मालूम होती हैं:
- अज़ान का जवाब देना सुन्नत है।
- उसके बाद नबी करीम ﷺ पर दरूद पढ़ना भी सुन्नत है और एक दरूद के बदले दस रहमतों की फ़ज़ीलत है।
दरूद पढ़ने का असल मक़सद क्या है?
दरूद शरीफ़ केवल ज़बान से कुछ अल्फ़ाज़ पढ़ लेने का नाम नहीं, बल्कि यह नबी करीम ﷺ से मुहब्बत और आपके हक़ को पहचानने का एक ज़रिया है।
जब हम दरूद पढ़ते हैं तो हमें यह भी याद रखना चाहिए कि जिस नबी ﷺ पर हम दरूद भेज रहे हैं, उन्होंने हमें तौहीद, नमाज़, रोज़ा, सदक़ा, अच्छे अख़लाक़ और अल्लाह की इताअत की तालीम दी।
इसलिए दरूद के साथ नबी ﷺ की सुन्नत पर चलने की कोशिश भी होनी चाहिए।
क्या दरूद पढ़ने के लिए कोई खास संख्या ज़रूरी है?
दरूद शरीफ़ की फ़ज़ीलत वाली सहीह हदीस में यह नहीं कहा गया कि हर मुसलमान के लिए रोज़ाना कोई एक निश्चित संख्या अनिवार्य है।
इसलिए कोई व्यक्ति अपनी आसानी के मुताबिक़ जितना चाहे दरूद पढ़ सकता है।
मसलन:
- 10 बार
- 100 बार
- 300 बार
- या इससे भी ज़्यादा
लेकिन किसी खास संख्या को नबी ﷺ की तरफ़ से तयशुदा सुन्नत कहना अलग बात है और उसके लिए अलग दलील चाहिए।
इसलिए बेहतर है कि हम दरूद की कसरत करें, लेकिन जिस संख्या की कोई सहीह दलील न हो उसे नबी ﷺ की तरफ़ से तयशुदा न बताएं।
क्या केवल एक ही दरूद पढ़ना ज़रूरी है?
नहीं।
नबी करीम ﷺ ने सहाबा को दरूद के अलग-अलग मस्नून अल्फ़ाज़ सिखाए हैं। नमाज़ में पढ़ा जाने वाला दरूद-ए-इब्राहीमी सबसे मशहूर है।
इसलिए मस्नून दरूद पढ़ना बहुत बेहतर है।
साथ ही नबी करीम ﷺ पर सलात व सलाम के दूसरे सहीह अल्फ़ाज़ भी पढ़े जा सकते हैं।
दरूद पढ़ना कितना आसान अमल है?
दरूद शरीफ़ की खूबी यह भी है कि इसके लिए किसी खास जगह या समय का इंतज़ार नहीं करना पड़ता।
इंसान:
- घर में दरूद पढ़ सकता है।
- सफ़र में दरूद पढ़ सकता है।
- काम करते हुए दरूद पढ़ सकता है।
- आराम करते हुए दरूद पढ़ सकता है।
- अज़ान के बाद दरूद पढ़ सकता है।
- नबी करीम ﷺ का नाम सुनकर दरूद पढ़ सकता है।
और सबसे बड़ी बात यह कि एक दरूद के बदले दस रहमतों की खुशखबरी सहीह हदीस में मौजूद है।
दरूद पढ़ने वाले के लिए कितनी बड़ी खुशखबरी है?
अगर कोई व्यक्ति रोज़ाना सिर्फ़ 100 बार दरूद पढ़ता है तो वह 100 बार एक नेक अमल करता है और हर एक दरूद पर अल्लाह की दस रहमतों वाली फ़ज़ीलत उसे हासिल होती है।
लेकिन हमें इसे केवल गिनती का अमल नहीं बनाना चाहिए।
दरूद पढ़ते समय दिल में नबी करीम ﷺ की मुहब्बत, आपकी तालीमात की याद और आपकी सुन्नत पर चलने का जज़्बा होना चाहिए।
दरूद और नबी करीम ﷺ से मुहब्बत
नबी करीम ﷺ से मुहब्बत ईमान का अहम हिस्सा है।
दरूद शरीफ़ इस मुहब्बत को ज़िंदा रखने का एक बेहतरीन ज़रिया है। जब इंसान बार-बार अपने नबी ﷺ पर दरूद पढ़ता है तो उसके दिल में नबी ﷺ की याद ताज़ा रहती है।
लेकिन सच्ची मुहब्बत का तक़ाज़ा यह भी है कि इंसान नबी ﷺ की लाई हुई तालीम को माने और आपकी सुन्नत की पैरवी करे।
इसलिए हमारा मामूल होना चाहिए:
दरूद पढ़ें → नबी ﷺ को याद करें → आपकी सुन्नत सीखें → उस पर अमल करें।
👉 Kya Hoga Us din Jab koi kisi ke kaam nahi aayega.Qiyamat ka Ek Khaufnak Manzar Padhen Yahan
Conclusion:
नबी करीम हज़रत मुहम्मद ﷺ पर दरूद पढ़ना बहुत बड़ी फ़ज़ीलत और सवाब का अमल है।
क़ुरआन मजीद में अल्लाह तआला ने ईमान वालों को नबी ﷺ पर दरूद और सलाम भेजने का हुक्म दिया है।
सहीह मुस्लिम 408 में साफ़ तौर पर आया है कि जो व्यक्ति नबी ﷺ पर एक बार दरूद भेजता है, अल्लाह उस पर दस बार रहमत भेजता है।
और जामे तिर्मिज़ी 484 में आया है कि क़यामत के दिन नबी ﷺ के सबसे क़रीब वह व्यक्ति होगा जो आप ﷺ पर सबसे अधिक दरूद भेजता था। इमाम तिर्मिज़ी ने इसे हसन ग़रीब कहा है।
इसलिए हमें चाहिए कि दरूद शरीफ़ को अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बनाएं। कम पढ़ें लेकिन पाबंदी से पढ़ें, और साथ ही नबी करीम ﷺ की सुन्नत और तालीमात पर अमल करने की कोशिश करें।
अल्लाह तआला हमें अपने प्यारे नबी हज़रत मुहम्मद ﷺ पर कसरत से दरूद व सलाम पढ़ने, आपकी मुहब्बत हासिल करने और आपकी सुन्नत पर चलने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।
हदीस के मुख्य संदर्भ
- क़ुरआन — सूरह अल-अहज़ाब 33:56: ईमान वालों को नबी ﷺ पर दरूद व सलाम भेजने का हुक्म।
- सहीह मुस्लिम 408: एक बार दरूद पढ़ने पर अल्लाह की दस रहमतें।
- सहीह मुस्लिम 384: अज़ान के बाद दरूद पढ़ने और एक दरूद पर दस रहमतों की फ़ज़ीलत।
- जामे तिर्मिज़ी 484: क़यामत में नबी ﷺ के सबसे क़रीब होने की फ़ज़ीलत; इमाम तिर्मिज़ी ने इसे हसन ग़रीब कहा।
FAQs
1. Nabi Kareem ﷺ par Durood padhne ki kya fazilat hai?
Nabi Kareem ﷺ par Durood padhne ki badi fazilat yeh hai ke ek martaba Durood padhne par Allah Ta'ala banday par das rahmatein nazil farmata hai. Yeh fazilat Sahih Muslim ki hadith se sabit hai.
2. Ek baar Durood padhne par kitni rahmatein milti hain?
Sahih Muslim ki hadith ke mutabiq, jo shakhs Nabi ﷺ par ek baar Durood bhejta hai, Allah Ta'ala us par das rahmatein bhejta hai.
3. Kya Durood padhna Quran se sabit hai?
Ji haan. Surah Al-Ahzab, Ayat 56 mein Allah Ta'ala ne Mominon ko Nabi ﷺ par Durood aur Salam bhejne ka hukm diya hai.
4. Kya Durood padhne wala Qayamat mein Nabi ﷺ ke qareeb hoga?
Ji haan. Jami' Tirmidhi ki hadith mein hai ke Qayamat ke din Nabi ﷺ ke sabse qareeb woh shakhs hoga jo aap ﷺ par sabse zyada Durood bhejta hoga.
5. Kya Durood sirf Juma ke din padhna chahiye?
Nahi. Durood har din padha ja sakta hai. Juma ke din kasrat se Durood padhne ke hawale se riwayat bhi milti hai, lekin is article mein fazilat ke liye bunyadi daleel Quran aur sahih/mustahkam ahadith par rakhi gayi hai.
6. Kaunsa Durood padhna behtar hai?
Durood-e-Ibrahimi sabse mashhoor masnoon Durood hai, jo Nabi Kareem ﷺ ne Sahaba رضي الله عنهم ko sikhaya. Namaz mein bhi ise padha jata hai.
7. Kya Durood padhne ke liye koi khaas tadaad zaroori hai?
Nahi. Durood ki fazilat wali sahih ahadith mein rozana kisi ek khaas tadaad ko lazim nahi kiya gaya. Insan apni sahulat ke mutabiq kasrat se Durood padh sakta hai.
8. Kya Durood padhna Nabi ﷺ se muhabbat ki alamat hai?
Durood padhna Nabi Kareem ﷺ ki yaad aur aap ﷺ se muhabbat ka izhar hai. Lekin sachchi muhabbat ka taqaza yeh bhi hai ke Musalman Nabi ﷺ ki sunnat aur taleemat par amal kare.

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