चाहे मामला दुनियावी हो या आख़िरत का, आपकी ज़रूरत चाहे कितनी ही बड़ी क्यों न हो और अपने आप को अपने नज़र में कितने ही बुरे क्यों न समझते हों—अल्लाह से दुआ कीजिए। क्योंकि जब अल्लाह ने इब्लीस की सुन ली यानी Jab iblees ki Dua Qabool ho sakti hai To Hamari Kyun Nahi?
आप कभी उस हद तक नहीं पहुँच सकते जहाँ इब्लीस पहुँच गया था।
और आप उन मुशरिकों की हालत तक भी नहीं पहुँचे, जिनका ज़िक्र क़ुरआन में आया है। आप अल्लाह के फ़ज़्ल से अहले-तौहीद, अहले-इस्लाम और अहले-सुन्नत में से हैं।
इसलिए शैतान के बहकावे में आकर अल्लाह से दुआ करना मत छोड़िए।
बहुत से लोग कहते हैं: “मैंने गुनाह किया है, मैं गुनाहगार हूं, इसलिए मुझे दुआ करते हुए शर्म आती है। या मुझे लगता है कि अल्लाह मेरी दुआ क़ुबूल नहीं करेगा, क्योंकि मैंने कोताही की, अपने ऊपर ज़ुल्म किया और गुनाह किया है।”
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| Allha har Ek ki Pukar sunta hai |
इसके बाद शैतान उसके दिल में एक खतरनाक ख़याल डालता है:
“तुमने गुनाह किया है, अब तुम अल्लाह से दुआ कैसे कर सकते हो?”
कभी वह कहता है:
“तुम बहुत गुनाहगार हो, अल्लाह तुम्हारी दुआ नहीं सुनेगा।”
यही शैतान का एक बड़ा धोखा है।
तौबा करने वालों से अल्लाह की मुहब्बत
गुनाह के बाद अल्लाह से दूर होना नहीं, बल्कि अल्लाह की तरफ़ और ज़्यादा लौटना चाहिए। गुनाहगार इंसान के लिए अल्लाह का दरवाज़ा बंद नहीं होता। बल्कि तौबा, इस्तिग़फ़ार और दुआ के ज़रिए उसी दरवाज़े पर लौटना उसके लिए सबसे बड़ी ज़रूरत है। और तौबा करने वालों के लिए अल्लाह का यह फ़रमान है
इंसान ज़रा गौर करे कि अल्लाह अज़्ज़ व जल्ल ने अपनी मख़लूक़ में सबसे बदतरीन की दुआ भी क़ुबूल की।
जब हम अल्लाह की मख़लूक़ में सबसे बदतरीन का उदाहरण देते हैं तो वह कौन है? "इब्लीस" जब उसने अल्लाह की नाफ़रमानी की और आदम अलैहिस्सलाम को सज्दा करने से इनकार किया, तो उसने अल्लाह से एक मोहलत माँगी।
इब्लीस ने कहा:
فَأَنظِرْنِي إِلَىٰ يَوْمِ يُبْعَثُونَ
“तो मुझे उस दिन तक मोहलत दे दीजिए जब लोग दोबारा उठाए जाएँगे।”
अल्लाह तआला ने फ़रमाया:
فَإِنَّكَ مِنَ الْمُنظَرِينَ إِلَىٰ يَوْمِ الْوَقْتِ الْمَعْلُومِ
“तो बेशक तू मोहलत दिए जाने वालों में से है, एक मालूम वक़्त के दिन तक।”
(सूरह अल-हिज्र 15:37-38)
इसी तरह सूरह अल-आराफ़ में भी इब्लीस की यह माँग और उसे मोहलत दिए जाने का ज़िक्र आया है।
सुब्हानल्लाह!
जब अल्लाह तआला ने इब्लीस की भी दुआ क़ुबूल कर ली, जबकि वह अल्लाह की मख़लूक़ में सबसे बदतरीन और सबसे नाफ़रमान था, तो फिर आप एक मोमिन और मुवह्हिद हैं। आपकी ग़लतियाँ और गुनाह चाहे कितने ही क्यों न हों, अल्लाह के बारे में अच्छा गुमान रखिए और उससे दुआ करते रहिए
दुआ क़ुबूल होना हमेशा अल्लाह की रज़ामंदी की निशानी नहीं
यहाँ एक बहुत अहम बात समझने की ज़रूरत है:
इब्लीस की माँग पूरी हुई, लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि अल्लाह इब्लीस से राज़ी था? हरगिज़ नहीं।
इब्लीस अल्लाह का नाफ़रमान था और क़ियामत तक उसके लिए लानत और अज़ाब का मामला है।
इसलिए इस उदाहरण का मतलब यह नहीं कि “इब्लीस नेक था इसलिए उसकी दुआ क़ुबूल हुई।” बल्कि इससे यह समझ आता है कि अल्लाह अपने फ़ैसले और हिकमत के मुताबिक़ किसी की माँग पूरी कर सकता है।
इसलिए जब कोई मोमिन यह सोचता है कि:
“मैं गुनाहगार हूँ, इसलिए मैं अल्लाह से दुआ नहीं कर सकता।”
तो यह सोच सही नहीं है।
गुनाहगार होने की वजह से दुआ छोड़ देना शैतान का धोखा है
मान लीजिए किसी इंसान से गुनाह हो गया।
उसे नमाज़ में कोताही पर अफ़सोस है। उसने अपनी ज़िंदगी में गलतियाँ की हैं। वह अपने आपको बहुत बुरा समझता है।
ऐसे समय शैतान चाहता है कि वह अल्लाह से दूर हो जाए।
पहले शैतान इंसान को गुनाह की तरफ़ ले जाता है और फिर उसी गुनाह को बहाना बनाकर कहता है:
“अब तुम अल्लाह के सामने कैसे जाओगे?”
यह शैतान का धोखा है।
बंदे को कहना चाहिए:
“मैं गुनाहगार हूँ, इसलिए मुझे अल्लाह की और ज़्यादा ज़रूरत है।”
अगर इंसान गुनाह के बाद दुआ भी छोड़ दे, नमाज़ भी छोड़ दे और तौबा भी छोड़ दे, तो वह शैतान के जाल में और फँसता चला जाता है।
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अल्लाह गुनाहगार बंदे को भी अपनी तरफ़ बुलाता है
अल्लाह तआला फ़रमाता है:
قُلْ يَا عِبَادِيَ الَّذِينَ أَسْرَفُوا عَلَىٰ أَنفُسِهِمْ لَا تَقْنَطُوا مِن رَّحْمَةِ اللَّهِ
“कह दीजिए: ऐ मेरे वे बंदो जिन्होंने अपनी जानों पर ज़्यादती की है! अल्लाह की रहमत से मायूस न हो।”
(सूरह अज़-ज़ुमर 39:53)
गौर कीजिए, यहाँ अल्लाह ने गुनाहगारों को भी “मेरे बंदे” कहकर पुकारा।
फिर फ़रमाया:
“अल्लाह की रहमत से मायूस न हो।”
इसलिए गुनाह के बाद निराश होकर बैठ जाना इस आयत की रूह के ख़िलाफ़ है।
बंदे को चाहिए कि वह अपने गुनाह पर शर्मिंदा हो, तौबा करे, इस्तिग़फ़ार करे और अल्लाह से दुआ करता रहे।
अल्लाह से मायूस होना शैतान का रास्ता है
शैतान चाहता है कि इंसान पहले गुनाह करे और फिर गुनाह के बाद यह समझ बैठे कि अब उसके लिए कोई उम्मीद नहीं।
लेकिन मोमिन का रास्ता इससे अलग है।
- वह गिरता है तो उठता है।
- गुनाह करता है तो तौबा करता है।
- कमज़ोर पड़ता है तो अल्लाह से मदद माँगता है।
- और जब दिल टूटता है तो उसी रब के सामने अपना हाल रखता है।
इसीलिए दुआ छोड़ देना समाधान नहीं है।
गुनाह दुआ छोड़ने की वजह नहीं, बल्कि अल्लाह की तरफ़ लौटने की वजह होना चाहिए।
मुसीबत में मुशरिक भी अल्लाह को पुकारते थे
क़ुरआन मजीद में अल्लाह तआला ने उन लोगों की हालत भी बयान की जो शिर्क करते थे।
अल्लाह तआला फ़रमाता है:
فَإِذَا رَكِبُوا فِي الْفُلْكِ دَعَوُا اللَّهَ مُخْلِصِينَ لَهُ الدِّينَ فَلَمَّا نَجَّاهُمْ إِلَى الْبَرِّ إِذَا هُمْ يُشْرِكُونَ
“फिर जब वे कश्ती में सवार होते हैं तो अल्लाह को पुकारते हैं, उसके लिए दीन को ख़ालिस करते हुए। फिर जब वह उन्हें ख़ुश्की तक पहुँचा देता है तो उसी वक़्त वे शिर्क करने लगते हैं।”
(सूरह अल-अनकबूत 29:65)
यानी वे पहले से मुशरिक थे और अल्लाह जानता था कि वे फिर शिर्क करेंगे। लेकिन जब उन्होंने उस वक़्त अल्लाह को सच्चे दिल से, ख़ालिस होकर और अपनी मजबूरी व ज़रूरत का इज़हार करते हुए पुकारा, तो अल्लाह तआला ने उनकी पुकार सुनी।
यह दुआ की अहमियत और अल्लाह की रहमत है कि इंसान जब सच्चे दिल से उसकी तरफ़ रुजू करता है तो वह उसकी पुकार सुनता है।
मुसीबत में उनकी फ़ितरत उन्हें अल्लाह की तरफ़ ले जाती थी। वे उस वक़्त अल्लाह को ख़ालिस होकर पुकारते थे।
इससे हमें दुआ और अल्लाह की तरफ़ रुजू करने की अहमियत समझ में आती है।
लेकिन यहाँ भी एक बात स्पष्ट रहनी चाहिए: दुआ की क़ुबूलियत किसी व्यक्ति के सही अक़ीदे या अल्लाह की रज़ामंदी की गारंटी नहीं है। अल्लाह की हिकमत के मुताबिक़ किसी की माँगी हुई चीज़ मिल सकती है, जबकि वह व्यक्ति बाद में फिर नाफ़रमानी करे।
अगर आप गुनाहगार हैं तो दुआ और भी ज़्यादा कीजिए
अगर आपने गुनाह किया है तो यह मत कहिए:
“मैं बहुत बुरा हूँ, मेरी दुआ कैसे क़ुबूल होगी?”
बल्कि कहिए:
“मैं कमज़ोर हूँ, मैं गुनाहगार हूँ और मुझे अपने रब की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है।”
अपने हाथ उठाइए और कहिए:
“या अल्लाह! मुझसे गुनाह हुआ है, मुझे माफ़ फ़रमा। मुझे सीधा रास्ता दिखा। मुझे अपनी नाफ़रमानी से बचा और अपनी इताअत की तौफ़ीक़ अता फ़रमा।”
यही बंदगी है।
दुआ के साथ तौबा भी ज़रूरी है
इसका मतलब यह नहीं कि इंसान गुनाह करता रहे और सिर्फ़ यह सोचता रहे कि “मैं दुआ करता रहूँगा।”
बल्कि सच्ची दुआ के साथ सच्ची तौबा भी होनी चाहिए।
तौबा का मतलब है:
- गुनाह को छोड़ना।
- अपने किए पर शर्मिंदा होना।
- अल्लाह से माफ़ी माँगना।
- दोबारा गुनाह न करने का इरादा करना।
- अगर किसी बंदे का हक़ मारा है तो उसका हक़ अदा करना या उससे माफ़ी माँगना।
इसलिए दुआ और तौबा एक-दूसरे से अलग नहीं हैं।
“मेरी दुआ क़ुबूल नहीं होगी” — यह सोच भी छोड़ दें
अल्लाह तआला फ़रमाता है:
وَقَالَ رَبُّكُمُ ادْعُونِي أَسْتَجِبْ لَكُمْ
“और तुम्हारे रब ने कहा: मुझे पुकारो, मैं तुम्हारी दुआ क़ुबूल करूँगा।”
(सूरह ग़ाफ़िर 40:60)
इसलिए बंदे का काम है कि वह अल्लाह से माँगता रहे और उसके बारे में अच्छा गुमान रखे।
हाँ, दुआ का नतीजा हमेशा हमारी इच्छा और हमारी तय की हुई शक्ल में आए, यह ज़रूरी नहीं। अल्लाह बेहतर जानता है कि हमारे लिए क्या अच्छा है।
- कभी इंसान वही चीज़ पा लेता है जो उसने माँगी थी।
- कभी किसी नुकसान को उससे दूर कर दिया जाता है।
- और कभी उसका अज्र आख़िरत के लिए रख दिया जाता है।
इसलिए दुआ करने वाला कभी घाटे में नहीं रहता, बशर्ते उसकी दुआ जायज़ हो और वह सब्र के साथ अल्लाह से माँगता रहे।
अपनी कमियों को देखकर अल्लाह का दरवाज़ा मत छोड़िए
- आपको अपने गुनाह याद आते हैं? अल्लाह को याद कीजिए।
- आपको अपनी कमज़ोरी दिखाई देती है? अल्लाह की क़ुदरत को याद कीजिए।
- आपको अपनी नाफ़रमानी याद आती है? अल्लाह की रहमत को याद कीजिए।
- आपको लगता है कि आप बहुत दूर निकल गए हैं? अल्लाह की तरफ़ एक कदम बढ़ाइए।
- आपकी ज़रूरत बहुत बड़ी है? अल्लाह उससे भी बड़ा है।
- आप अपने आपको बहुत गुनाहगार समझते हैं? अल्लाह की रहमत से मायूस मत हों।
दुआ सिर्फ़ नेक लोगों के लिए नहीं
दुआ केवल उन लोगों के लिए नहीं है जो अपने आपको बिल्कुल पाक समझते हैं।
बल्कि इंसान अपनी कमज़ोरी, मजबूरी और गुनाहों के बावजूद अल्लाह को पुकार सकता है।
बल्कि उसे पुकारना ही चाहिए।
- क्योंकि अगर गुनाहगार अल्लाह के दरवाज़े पर नहीं जाएगा तो फिर कहाँ जाएगा?
- अगर वह अपने रब से माफ़ी नहीं माँगेगा तो किससे माँगेगा?
- अगर वह अपने रब से मदद नहीं माँगेगा तो किससे माँगेगा?
- इसलिए शैतान की बात मत मानिए।
- अल्लाह से रिश्ता मत तोड़िए।
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याद रखिए: आप इब्लीस नहीं हैं
इब्लीस ने अल्लाह की नाफ़रमानी की, तकब्बुर किया और अपनी गलती पर अड़ा रहा।
लेकिन एक मोमिन की पहचान यह है कि जब उससे गुनाह हो तो वह अपने रब की तरफ़ लौटता है।
इसलिए अपने गुनाह को अपनी तबाही का बहाना न बनाइए।
- उसे अपनी तौबा का कारण बनाइए।
- अपने आँसुओं को दुआ बनाइए।
- अपनी शर्मिंदगी को इस्तिग़फ़ार बनाइए।
- और अपनी कमज़ोरी को अल्लाह से मदद माँगने का ज़रिया बनाइए।
हम सब इंसान हैं और हमसे ग़लतियाँ होती हैं।
आज हममें से कौन है जो यह कह सके कि उसने कभी अल्लाह की नाफ़रमानी नहीं की? अगर मैं अभी अपने भाइयों और बहनों से कहूँ कि जिन लोगों ने कभी अल्लाह की नाफ़रमानी नहीं की, वे अपने हाथ उठा दें, तो क्या आपको लगता है कि कोई अपना हाथ उठाएगा?
अगर अल्लाह के दरवाज़े पर सिर्फ़ नेक और एहसान करने वालों को ही आने की इजाज़त होती, तो गुनाहगार कहाँ जाता? वह किसके सामने अपना हाल रखता? वह किसकी पनाह लेता?
गुनाहगार चाहे जितने भी गुनाह कर चुका हो, उसे फिर भी अल्लाह ही की तरफ़ रुजू करना चाहिए।
वह अल्लाह की तरफ़ लौटे, उसी के लिए अपने दीन को ख़ालिस करे, सच्चे दिल के साथ उसे पुकारे और अल्लाह के बारे में अच्छा गुमान रखे।
Conclusion:
दुनियावी मामला हो या आख़िरत का मामला, आपकी ज़रूरत चाहे कितनी ही बड़ी क्यों न हो और आप अपनी नज़र में कितने ही बुरे क्यों न समझते हों—अल्लाह से दुआ कीजिए।गुनाह दुआ छोड़ने की वजह नहीं, बल्कि अल्लाह की तरफ़ लौटने की वजह होना चाहिए।
आप उस हद तक नहीं पहुँच सकते जहाँ इब्लीस पहुँच गया था।
लेकिन एक बात हमेशा याद रखें: इब्लीस की दुआ का क़ुबूल होना उसकी नेकनामी या अल्लाह की रज़ामंदी की निशानी नहीं था। इसलिए हमारा भरोसा किसी उदाहरण पर नहीं, बल्कि अल्लाह की रहमत, उसके वादे और उसकी हिकमत पर होना चाहिए।
गुनाह से बचिए, गुनाह हो जाए तो तौबा कीजिए, नमाज़ की पाबंदी कीजिए, लोगों के हक़ अदा कीजिए और हर हाल में अपने रब को पुकारते रहिए।
शैतान कहता है: “तुम गुनाहगार हो, अल्लाह से दूर हो जाओ।”
लेकिन क़ुरआन हमें मायूसी से रोकता है और अल्लाह की रहमत की तरफ़ लौटने का रास्ता दिखाता है।
इसलिए—
- दुआ मत छोड़िए।
- तौबा मत छोड़िए।
- अल्लाह की रहमत से मायूस मत होइए।
- और शैतान के इस धोखे में मत आइए कि आपके गुनाहों की वजह से अल्लाह का दरवाज़ा आपके लिए बंद हो गया है।
🤲 अल्लाह तआला हमें सच्ची तौबा करने, हर गुनाह से बचने, अपनी तरफ़ रुजू करने और हर जायज़ ज़रूरत में सिर्फ़ उसी से दुआ माँगने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए।
आमीन या रब्बल आलमीन।
FAQs:
1. क्या अल्लाह गुनाहगार इंसान की दुआ सुनता है?
जी हाँ। गुनाहगार इंसान को अल्लाह से दुआ और तौबा छोड़नी नहीं चाहिए। अल्लाह की रहमत से मायूस होना सही नहीं है।
2. क्या इब्लीस की दुआ अल्लाह ने क़ुबूल की थी?
जी हाँ, इब्लीस ने क़ियामत तक मोहलत माँगी और अल्लाह ने उसे एक मालूम वक़्त तक मोहलत दी। लेकिन यह उसकी फ़ज़ीलत या अल्लाह की रज़ामंदी की निशानी नहीं थी।
3. इब्लीस की दुआ क़ुबूल होने से हमें क्या सीख मिलती है?
इससे यह समझ आता है कि बंदे को अल्लाह से माँगना नहीं छोड़ना चाहिए। लेकिन दुआ क़ुबूल होना हमेशा अल्लाह की रज़ामंदी का प्रमाण नहीं होता।
4. क्या गुनाह करने के बाद अल्लाह से दुआ करना चाहिए?
जी हाँ। बल्कि गुनाह के बाद इंसान को तौबा, इस्तिग़फ़ार और दुआ के ज़रिए अल्लाह की तरफ़ लौटना चाहिए।
5. क्या “मैं बहुत गुनाहगार हूँ, मेरी दुआ क़ुबूल नहीं होगी” सोचना सही है?
नहीं। इंसान को अल्लाह की रहमत से मायूस नहीं होना चाहिए। सूरह अज़-ज़ुमर 39:53 में अल्लाह ने गुनाहगार बंदों को अपनी रहमत से मायूस न होने की ताकीद फ़रमाई है।
6. क्या हर दुआ उसी तरह क़ुबूल होती है जिस तरह हम चाहते हैं?
ज़रूरी नहीं। अल्लाह अपनी हिकमत के मुताबिक़ फैसला करता है। दुआ का जवाब कभी माँगी हुई चीज़ देकर, कभी किसी नुकसान को दूर करके और कभी आख़िरत के लिए अज्र रखकर हो सकता है।
7. दुआ के साथ तौबा करना क्यों ज़रूरी है?
अगर इंसान से गुनाह हुआ है तो उसे गुनाह छोड़कर अल्लाह से सच्ची तौबा करनी चाहिए। दुआ और इस्तिग़फ़ार के साथ अपने अमल को सुधारना भी ज़रूरी है।
8. क्या शैतान इंसान को दुआ करने से रोक सकता है?
शैतान इंसान के दिल में मायूसी और गलत ख़याल डालने की कोशिश करता है। जैसे यह सोचना कि “तुम गुनाहगार हो, इसलिए अल्लाह से मत माँगो।” मुसलमान को ऐसे बहकावे से बचना चाहिए।

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