इन्सान ख़ता का पुतला है ग़लती करते रहता है। उससे कभी न कभी गुनाह हो ही जाता है। शैतान उसे गुनाह करवाने के लिए उसके दिल में वसवसे डालते रहता है। और अल्लाह के ज़िक्र से दूर करते रहता है। "Allah ke Zikr Se Gaafil Na Raho", क्योंकि अल्लाह के ज़िक्र से ही हमारे दिलों को सकून है और आख़िरत की भलाई भी। क्या आप जानते हैं? अल्लाह के ज़िक्र से गाफ़िल होना कहीं आप को शैतान का साथी न बना दे।
इंसान की ज़िंदगी में कुछ ऐसी ग़लतियाँ होती हैं जिनका उसे एहसास होता है, इसलिए वह तौबा करके वापस लौट सकता है। लेकिन सबसे खतरनाक हालत वह है जब इंसान ग़लत रास्ते पर चलते हुए भी अपने आपको सही समझने लगे। और यही वो हालत है जब शैतान उसका साथी बन जाता है।
![]() |
| Zikr se gaflat ka anjam |
यह आर्टिकल "Allah ke Zikr Se Gaafil Na Raho" उनके के लिए एक याद दहानी और नसीहत है जो अल्लाह के ज़िक्र से गाफ़िल रहा करते हैं।
क़ुरआन का आगाह करना
क़ुरआन मजीद इस ख़तरे से हमें बहुत गंभीर अंदाज़ में आगाह करता है।
अल्लाह तआला फ़रमाता है:
وَمَنۡ یَّعۡشُ عَنۡ ذِکۡرِ الرَّحۡمٰنِ نُقَیِّضۡ لَہٗ شَیۡطٰنًا فَہُوَ لَہٗ قَرِیۡنٌ ٣٦
“और जो शख़्स रहमान के ज़िक्र से मुँह फेर ले, हम उस पर एक शैतान मुकर्रर कर देते हैं, फिर वह उसका साथी बन जाता है।”
(सूरह अज़-ज़ुख़रुफ़: 36)
इसके बाद अल्लाह तआला फ़रमाता है:
وَاِنَّہُمۡ لَیَصُدُّوۡنَہُمۡ عَنِ السَّبِیۡلِ وَیَحۡسَبُوۡنَ اَنَّہُمۡ مُّہۡتَدُوۡنَ ٣٧
“और बेशक वे (शैतान) उन्हें रास्ते से रोकते हैं, जबकि वे समझते हैं कि वे हिदायत पर हैं।”(सूरह अज़-ज़ुख़रुफ़: 37)
सबसे बड़ा ख़तरा: गुमराही का एहसास न होना
इन आयतों पर गौर कीजिए।
अल्लाह यह नहीं बता रहा कि शैतान इंसान को केवल गुनाह करवाता है। बल्कि इससे भी अधिक ख़तरनाक बात यह है कि शैतान इंसान को सही रास्ते से दूर करके उसे यह एहसास भी नहीं होने देता कि वह भटक चुका है।
बल्कि कभी-कभी वह अपने ग़लत काम के लिए दलीलें भी तैयार कर लेता है।
👉 यही शैतान की सबसे बड़ी चालों में से एक है।
ज़िक्र से ग़फ़लत क्या है?
अल्लाह का ज़िक्र केवल ज़ुबान से “सुब्हानल्लाह”, “अल्हम्दुलिल्लाह” और “अल्लाहु अकबर” कहने का नाम नहीं।
ज़िक्र का व्यापक अर्थ यह है कि इंसान अल्लाह को याद रखे, उसके आदेशों को याद रखे और अपनी ज़िंदगी को उसके मुताबिक़ गुज़ारने की कोशिश करे।
जब इंसान क़ुरआन से दूर होता है, नमाज़ में लापरवाही करता है, नसीहत सुनकर भी अनदेखा करता है और अपनी ख़्वाहिशों को अल्लाह के हुक्म पर प्राथमिकता देने लगता है, तो उसके दिल पर ग़फ़लत का असर बढ़ता जाता है।
और जब दिल खाली होता है तो शैतान के लिए रास्ता आसान हो जाता है।
शैतान इंसान को कैसे गुमराह करता है?
शैतान हमेशा यह नहीं कहता:
“गुनाह करो!”
कभी वह कहता है:
“अभी उम्र पड़ी है, बाद में तौबा कर लेना।”
कभी कहता है:
“इतना भी क्या दीनदार बनना?”
कभी कहता है:
“सब लोग ऐसा ही करते हैं।”
कभी कहता है:
“तुम्हारा दिल साफ़ है, बस यही काफ़ी है।”
और कभी इंसान के गुनाह को उसके सामने इस तरह सजाता है कि उसे गुनाह, गुनाह ही नहीं लगता।
यही वजह है कि मोमिन को अपने नफ़्स और शैतान दोनों से सावधान रहना चाहिए।
जब इंसान ग़लत को सही समझने लगे
सूरह अज़-ज़ुख़रुफ़ की अगली आयत का यह हिस्सा बेहद चिंताजनक है:
وَيَحْسَبُونَ أَنَّهُم مُّهْتَدُونَ
“और वे समझते हैं कि वे हिदायत पर हैं।”
सोचिए!
मुश्किल सिर्फ़ यह नहीं कि इंसान रास्ते से भटक गया।
मुश्किल यह भी है कि उसे अपने भटकने का एहसास ही नहीं रहा।
इसीलिए एक सच्चे मुसलमान को हमेशा अपने दिल का मुहासबा करते रहना चाहिए:
- क्या मेरी नमाज़ पहले से बेहतर हो रही है?
- क्या क़ुरआन से मेरा रिश्ता मज़बूत हो रहा है?
- क्या मेरे अंदर गुनाह से नफ़रत पैदा हो रही है?
- क्या मैं लोगों के अधिकारों का ख़याल रखता हूँ?
- क्या मुझे अपनी ग़लतियों का एहसास होता है?
- क्या नसीहत मिलने पर मैं उसे स्वीकार करता हूँ?
- क्या मैं अपनी राय को हर हाल में सही समझता हूँ?
क्योंकि हिदायत पर होने का दावा और वास्तव में हिदायत पर होना दो अलग बातें हैं।
👉 Dua ka daman kabhi na chhoren,jab Allah Shaitan mardood ki sun sakta hai to hamari kyun nahi?
अल्लाह का ज़िक्र दिल की हिफ़ाज़त है
क़ुरआन हमें बताता है:أَلَا بِذِكْرِ اللَّهِ تَطْمَئِنُّ الْقُلُوبُ
“सुन लो! अल्लाह के ज़िक्र ही से दिलों को इत्मीनान मिलता है।”
(सूरह अर-रअद: 28)
इसलिए ज़िक्र को केवल एक इबादत न समझें, बल्कि इसे अपने दिल की ज़रूरत समझें।
- सुबह और शाम अल्लाह को याद करें।
- क़ुरआन की तिलावत करें।
- नमाज़ों की पाबंदी करें।
- अल्लाह से दुआ करें।
- अपने गुनाहों पर इस्तिग़फ़ार करें।
और सबसे बढ़कर, अल्लाह के आदेशों को अपनी ज़िंदगी में लागू करने की कोशिश करें।
आज हमें अपने आप से एक सवाल पूछना चाहिए
- ♦️हम अक्सर दूसरों की गुमराही को पहचान लेते हैं, लेकिन क्या हम अपनी ग़फ़लत को भी पहचानते हैं?
- ♦️हम दूसरों की ग़लतियाँ गिन लेते हैं, लेकिन क्या कभी अपने दिल का हिसाब लिया?
- ♦️हम चाहते हैं कि शैतान हमें गुमराह न करे, लेकिन क्या हम उन रास्तों से बचते हैं जिनसे शैतान हमारे पास आता है?
इन आयतों का मक़सद केवल दूसरों को चेतावनी देना नहीं है।
यह मेरे और आपके लिए चेतावनी है।
अपने घरों को भी ज़िक्र से आबाद करें
आज मोबाइल, सोशल मीडिया, मनोरंजन और दुनिया की व्यस्तताओं ने हमारी ज़िंदगी का बहुत-सा समय ले लिया है।
- सुबह आँख खुलते ही मोबाइल।
- दिनभर दुनिया की खबरें।
- घंटों सोशल मीडिया।
- लेकिन क़ुरआन के लिए समय नहीं।
- ज़िक्र के लिए समय नहीं।
- नमाज़ में ख़ुशू के लिए समय नहीं।
हमें अपने आप से पूछना चाहिए:
जिस चीज़ को हम सबसे ज़्यादा समय देते हैं, क्या वही हमारे दिल की सबसे बड़ी प्राथमिकता बन चुकी है?
दिल जिस चीज़ में ज़्यादा व्यस्त रहता है, अक्सर इंसान उसी के रंग में रंगता चला जाता है।
इसलिए अपने दिल को अल्लाह के ज़िक्र से ज़िंदा रखना ज़रूरी है।
👉 Allah Iman walon ko kyun azmata hai Padhen yahan Haqeeqat
ग़फ़लत से बचने के कुछ आसान उपाय
1. पाँचों नमाज़ों की पाबंदी करें।
नमाज़ को बोझ नहीं बल्कि अल्लाह से मुलाक़ात का समय समझें।
2. रोज़ क़ुरआन पढ़ें।
कम पढ़ें, लेकिन नियमित पढ़ें और उसके अर्थ पर भी गौर करें।
3. सुबह-शाम के मस्नून अज़कार का एहतिमाम करें।
4. रोज़ इस्तिग़फ़ार करें।
इंसान गुनाह से बेनियाज़ नहीं है; उसे हमेशा अपने रब की तरफ़ लौटना चाहिए।
5. अच्छी संगत अपनाएँ।
संगत इंसान के ईमान और सोच पर गहरा असर डालती है।
6. अपने दिल का मुहासबा करें।
दिन ख़त्म होने से पहले कुछ पल अपने आमाल पर विचार करें।
7. गुनाह को छोटा न समझें।
छोटा समझकर बार-बार किया जाने वाला गुनाह दिल को प्रभावित कर सकता है।
Conclusion: Allah ke Zikr Se Gaafil Na Raho
सूरह अज़-ज़ुख़रुफ़ की ये आयतें हमें झकझोरने वाली चेतावनी देती हैं।
अल्लाह के ज़िक्र से ग़फ़लत इंसान को धीरे-धीरे ऐसी हालत तक पहुँचा सकती है जहाँ शैतान उसका साथी बन जाए और वह उसे सही रास्ते से रोकता रहे—और इंसान फिर भी समझता रहे कि मैं सही हूँ।
इसलिए हमें दूसरों का मुहासबा करने से पहले अपना मुहासबा करना चाहिए।
आज ही अपने दिल से पूछिए:
क्या मेरा दिल अल्लाह के ज़िक्र से जुड़ा हुआ है?
अगर कमी महसूस हो तो देर न करें।
नमाज़ की तरफ़ लौटें।
क़ुरआन की तरफ़ लौटें।
ज़िक्र की तरफ़ लौटें।
तौबा और इस्तिग़फ़ार की तरफ़ लौटें।
क्योंकि जिस दिल को अल्लाह की याद से ज़िंदा रखा जाए, उसके लिए शैतान के रास्ते पर चलना आसान नहीं रहता।
🤲 अल्लाह तआला हमें अपने ज़िक्र से ग़ाफ़िल होने से बचाए, शैतान के वसवसों से हमारी हिफ़ाज़त फ़रमाए और हमें सच्ची हिदायत पर क़ायम रखे। आमीन।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
1. सूरह अज़-ज़ुख़रुफ़ आयत 36 में क्या बताया गया है?
सूरह अज़-ज़ुख़रुफ़ की आयत 36 में बताया गया है कि जो व्यक्ति रहमान के ज़िक्र से ग़फ़लत बरतता है, उसके लिए शैतान को उसका साथी बना दिया जाता है।
2. अल्लाह के ज़िक्र से ग़फ़लत का क्या नुकसान है?
अल्लाह के ज़िक्र से ग़फ़लत इंसान को धीरे-धीरे हिदायत से दूर कर सकती है और शैतान के बहकावे के लिए रास्ता आसान कर सकती है। आयत 37 में बताया गया है कि शैतान उन्हें रास्ते से रोकता है, जबकि वे समझते हैं कि वे हिदायत पर हैं।
3. शैतान इंसान को किस तरह गुमराह करता है?
शैतान इंसान को गुनाहों की तरफ़ बुलाता, बुरे कामों को आकर्षक बनाता और कभी-कभी उसे इस भ्रम में डाल देता है कि उसका रास्ता सही है। इसलिए इंसान को क़ुरआन, सुन्नत और अल्लाह के ज़िक्र से जुड़े रहना चाहिए।
4. क्या अल्लाह का ज़िक्र सिर्फ़ तस्बीह पढ़ने का नाम है?
नहीं। अल्लाह का ज़िक्र व्यापक अर्थ रखता है। इसमें अल्लाह को याद करना, उसकी किताब पढ़ना, नमाज़ कायम करना, दुआ और इस्तिग़फ़ार करना तथा उसके आदेशों के मुताबिक़ ज़िंदगी गुज़ारने की कोशिश करना शामिल है।
5. सूरह अज़-ज़ुख़रुफ़ आयत 37 का मुख्य संदेश क्या है?
इस आयत का एक महत्वपूर्ण संदेश यह है कि शैतान इंसान को सीधे रास्ते से रोकता है और सबसे चिंताजनक स्थिति यह है कि इंसान भटकने के बावजूद अपने आपको हिदायत पर समझता है।
6. अल्लाह के ज़िक्र से दिल को क्या फायदा होता है?
क़ुरआन बताता है कि “अल्लाह के ज़िक्र ही से दिलों को इत्मीनान मिलता है।” (सूरह अर-रअद: 28) इसलिए ज़िक्र मोमिन के दिल को अल्लाह से जोड़ने का महत्वपूर्ण ज़रिया है।
7. शैतान से बचने के लिए क्या करना चाहिए?
नमाज़ की पाबंदी, क़ुरआन से जुड़ाव, अल्लाह का ज़िक्र, मस्नून अज़कार, इस्तिग़फ़ार, अच्छी संगत और गुनाहों से बचने की कोशिश इंसान को अल्लाह की इताअत पर क़ायम रहने में मदद करती है।
8. सूरह अज़-ज़ुख़रुफ़ की आयत 36 और 37 हमें क्या सीख देती हैं?
ये आयतें हमें अपनी ग़फ़लत से सावधान करती हैं और याद दिलाती हैं कि इंसान को केवल यह देखकर संतुष्ट नहीं होना चाहिए कि वह अपने आपको सही समझता है, बल्कि उसे क़ुरआन और सही सुन्नत की रोशनी में अपने रास्ते और आमाल का जायज़ा लेते रहना चाहिए।

0 Comments