क़ियामत का दिन इंसान की पूरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा और सख़्त फ़ैसले का दिन होगा। उस दिन न दौलत काम आएगी, न दुनिया की ताक़त, न रिश्ते और न कोई झूठा सहारा। हर इंसान को अपने ईमान और आमाल के साथ अपने रब के सामने खड़ा होना होगा।
क़ियामत की इसी हौलनाक मंज़िल के बारे में नबी करीम ﷺ ने एक ऐसी हदीस बयान फ़रमाई है जिसे सुनकर सहाबा किराम रज़ी अल्लाहु अन्हुम भी बेहद परेशान हो गए थे। हदीस में आता है कि अल्लाह तआला हज़रत आदम अलैहिस्सलाम को पुकारेंगे और जहन्नम में जाने वालों को अलग करने का हुक्म देंगे। जब पूछा जाएगा कि उनकी संख्या कितनी है, तो बताया जाएगा कि Har 1000 Me 999 जहन्नम के लिए होंगे।
यह सुनकर सहाबा रज़ी अल्लाहु अन्हुम ने फ़ौरन पूछा कि फिर हममें से वह कौन होगा? लेकिन नबी करीम ﷺ ने उन्हें मायूस नहीं किया, बल्कि याजूज-माजूज के बारे में बताते हुए उम्मते-मुहम्मदिया के लिए बड़ी खुशखबरी सुनाई। आपने ﷺ उम्मीद ज़ाहिर फ़रमाई कि आपकी उम्मत जन्नत वालों का एक चौथाई, फिर एक तिहाई और फिर आधा हिस्सा होगी।
✍️ By: Mohib Tahiri| 🕋 islamic Article|Qiyamat ka Khaufnak Manzar|Aakhirat ki taiyari|🕰 Updated:20 Aug 2026
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Qiyamat Haqeeqat hai koi kahani nahi |
तो आखिर इस हदीस में Har 1000 Me 999 का क्या मतलब है? क़ियामत के दिन क्या होगा? याजूज-माजूज का इसमें क्या संबंध है? और इस हदीस से हमारे लिए क्या सबक़ निकलता है?
आइए, सहीह अहादीस की रोशनी में इस हदीस को समझते हैं।
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क़ियामत के दिन अल्लाह तआला हज़रत आदम अलैहिस्सलाम को पुकारेंगे
नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया कि क़ियामत के दिन अल्लाह तआला हज़रत आदम अलैहिस्सलाम को पुकारेंगे।
हज़रत आदम अलैहिस्सलाम जवाब देंगे:
"लब्बैक व सअदैक, वल-ख़ैरु फ़ी यदैका"
यानी मैं हाज़िर हूँ, ऐ मेरे रब! और सारी भलाई तेरे ही हाथ में है।
इसके बाद अल्लाह तआला फ़रमाएंगे कि जहन्नम में जाने वालों को अलग कर लिया जाए।
हज़रत आदम अलैहिस्सलाम पूछेंगे:
"ऐ मेरे रब! जहन्नम वालों की संख्या कितनी है?"
जवाब मिलेगा:
"हर 1000 में से 999"
यह सुनना ही इंसान के दिल को हिला देने के लिए काफी है।
हर 1000 में 999 जहन्नमी का क्या मतलब है?
यह हदीस पहली नज़र में बहुत डरावनी लगती है। सहाबा किराम रज़ी अल्लाहु अन्हुम भी यह सुनकर बेहद फ़िक्रमंद हो गए थे और उन्होंने नबी करीम ﷺ से पूछा कि अगर ऐसा है तो हममें से वह एक कौन होगा?
यहीं पर हदीस का अगला हिस्सा हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
नबी करीम ﷺ ने सहाबा को बताया कि उन 1000 में से 999 याजूज-माजूज होंगे और तुममें से एक व्यक्ति होगा।
इसलिए इस हदीस को केवल पहली पंक्ति तक पढ़कर यह समझ लेना सही नहीं कि मुसलमानों में से हर 1000 में केवल एक ही व्यक्ति जन्नत में जाएगा।
हदीस स्वयं अगले हिस्से में इसकी वज़ाहत कर देती है।
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याजूज-माजूज कौन हैं?
याजूज और माजूज क़ुरआन में वर्णित एक बड़ी क़ौम है। क़ुरआन मजीद में सूरह अल-कहफ़ और सूरह अल-अंबिया में उनका ज़िक्र मिलता है।
अल्लाह तआला फ़रमाता है:
"यहाँ तक कि जब याजूज और माजूज खोल दिए जाएंगे और वे हर ऊँचाई से निकल पड़ेंगे।"(सूरह अल-अंबिया 21:96)
याजूज-माजूज की संख्या बहुत अधिक होगी। इसी वजह से नबी करीम ﷺ की इस हदीस में 1000 में 999 के अनुपात का ज़िक्र आया है।
यह हिस्सा हमें यह समझाता है कि क़ियामत के दिन बड़ी संख्या में जहन्नम में जाने वालों के संबंध में याजूज-माजूज का बहुत बड़ा हिस्सा होगा।
Note:
फिर क्या तुम लोगों ने ये समझ रखा है कि यूँ ही जन्नत में दाख़िला तुम्हें मिल जाएगा, हालाँकि अभी तुम पर वो सब कुछ नहीं गुज़रा है जो तुमसे पहले ईमान लानेवालों पर गुज़र चुका है? उन लोगों पर सख़्तियाँ गुज़रीं, मुसीबतें आईं, हिला मारे गए, यहाँ तक कि वक़्त का रसूल और उसके साथी ईमानवाले चीख़ उठे कि अल्लाह की मदद कब आएगी? [ उस वक़्त उन्हें तसल्ली दी गई कि] हाँ, अल्लाह की मदद क़रीब है। सूरह अल बकरह
क़ियामत की दहशत कैसी होगी?
इस हदीस का सबसे खौफनाक हिस्सा वह है जिसमें क़ियामत की दहशत का वर्णन किया गया है।
नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया कि उस समय:
- हर गर्भवती औरत अपना गर्भ गिरा देगी।
- लोग ऐसे दिखाई देंगे जैसे नशे में हों।
- जबकि वे वास्तव में नशे में नहीं होंगे।
- बल्कि अल्लाह का अज़ाब अत्यंत सख़्त होगा।
सोचिए!
जिस दुनिया में इंसान छोटी-सी परेशानी से घबरा जाता है, उस दिन की दहशत कितनी भयानक होगी कि बच्चे तक बूढ़े दिखाई देने लगेंगे।
यह क़ियामत की उस हक़ीक़त की तरफ़ इशारा है जिसे इंसान आज अपनी आँखों से नहीं देख सकता, लेकिन अल्लाह और उसके रसूल ﷺ की बताई हुई ख़बर पर ईमान रखता है।
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सहाबा किराम रज़ी अल्लाहु अन्हुम क्यों घबरा गए?
जब नबी करीम ﷺ ने बताया कि हर 1000 में से 999 जहन्नम में जाने वालों को अलग किया जाएगा, तो सहाबा किराम रज़ी अल्लाहु अन्हुम पर इसका बहुत गहरा असर हुआ।
उन्होंने अर्ज़ किया:
"या रसूलल्लाह! हममें से वह एक कौन होगा?"
यह सवाल सहाबा के दिल की कैफ़ियत को दिखाता है। वे केवल सुनने वाले लोग नहीं थे। वे अपनी आख़िरत को लेकर चिंतित रहने वाले लोग थे। उन्होंने यह नहीं पूछा कि जहन्नम कितनी दूर है या क़ियामत कब आएगी।
उनकी चिंता थी:
"हमारा अंजाम क्या होगा?"
यही एक सच्चे मोमिन की पहचान है कि वह अपने अंजाम को लेकर बेफ़िक्र नहीं रहता।
नबी ﷺ ने उम्मत को खुशखबरी दी
सहाबा रज़ी अल्लाहु अन्हुम की परेशानी देखकर नबी करीम ﷺ ने उन्हें खुशखबरी दी:
"खुश हो जाओ!"
क्योंकि उन 1000 में से बड़ी संख्या याजूज-माजूज की होगी और तुममें से एक होगा।
इसके बाद नबी करीम ﷺ ने उम्मते-मुहम्मदिया के बारे में उम्मीद ज़ाहिर फ़रमाई कि आपकी उम्मत जन्नत वालों का:
एक चौथाई
होगी।
सहाबा ने अल्लाहु अकबर कहा।
फिर आपने ﷺ फ़रमाया कि मुझे उम्मीद है कि तुम जन्नत वालों का:
एक तिहाई
होगे।
सहाबा ने फिर अल्लाहु अकबर कहा।
फिर नबी करीम ﷺ ने उम्मीद ज़ाहिर फ़रमाई कि आपकी उम्मत जन्नत वालों का:
आधा
हिस्सा होगी।
यह उम्मते-मुहम्मदिया के लिए कितनी बड़ी खुशखबरी है!
क्या इसका मतलब है कि हर मुसलमान जन्नत में जाएगा?
नहीं।
इस हदीस का मतलब यह नहीं कि केवल मुसलमान कहलाने वाला हर व्यक्ति बिना हिसाब-किताब के जन्नत में चला जाएगा।
इस्लाम में जन्नत के लिए ईमान, तौहीद, अल्लाह की इताअत और नेक अमाल की अहमियत है।
इंसान को अपनी आख़िरत के बारे में न तो बेख़ौफ़ होना चाहिए और न अल्लाह की रहमत से मायूस।
एक मोमिन की ज़िंदगी ख़ौफ़ और उम्मीद के बीच होती है।
वह जहन्नम से डरता है और साथ ही अल्लाह की रहमत से जन्नत की उम्मीद रखता है।
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"काले बैल पर एक सफेद बाल" की मिसाल क्यों दी?
नबी करीम ﷺ ने उम्मते-मुहम्मदिया की तादाद से मुतल्लिक़ में एक बहुत अच्छी मिसाल दी। आप ﷺ ने बताया कि लोगों के मुकाबले मुसलमानों की स्थिति ऐसी होगी जैसे:
काले बैल की खाल पर एक सफेद बाल या सफेद बैल की खाल पर एक काला बाल।
इस मिसाल का मुराद यह समझाना है कि तमाम इंसानों के मुकाबले में मुसलमानों की तादाद एक छोटे से हिस्से जैसी होगी, जबकि जन्नत वालों में उम्मत की बड़ी हिस्सेदारी होगी।
इसमें एक ख़ास बात यह भी है कि संख्या का बड़ा होना अपने आप में सफलता की गारंटी नहीं है।
असल सफलता ईमान और अल्लाह की आज्ञाकारिता में है।
इस हदीस से हमें क्या सबक मिलता है?
1. क़ियामत हक़ / निश्चित है
- क़ियामत कोई काल्पनिक कहानी नहीं बल्कि इस्लामी अक़ीदे का मूल हिस्सा है।
- एक दिन हर इंसान को अल्लाह के सामने पेश होना है।
- इसलिए दुनिया की ज़िंदगी को हमेशा की ज़िंदगी समझना बहुत बड़ी भूल है।
2. आख़िरत के लिए तैयारी ज़रूरी है
इंसान दुनिया में घर बनाने, कारोबार बढ़ाने और भविष्य सुरक्षित करने के लिए बहुत मेहनत करता है।
लेकिन क्या उसने अपनी आख़िरत के लिए भी तैयारी की?
यह हदीस हमें अपने आप से यह सवाल पूछने पर मजबूर करती है:
अगर आज मेरी मौत आ जाए तो क्या मैं अल्लाह के सामने जाने के लिए तैयार हूँ?
3. गुनाहों से तौबा में देर नहीं करनी चाहिए
- इंसान को मालूम नहीं कि उसकी मौत कब आएगी।
- इसलिए तौबा को कल पर छोड़ना समझदारी नहीं।
- आज ही अपने गुनाहों से सच्ची तौबा करें और अल्लाह की तरफ़ लौट आएं।
4. नबी ﷺ ने उम्मत को मायूस नहीं किया
- हदीस के शुरुआती हिस्से में जब सहाबा बेहद चिंतित हुए तो नबी करीम ﷺ ने उन्हें खुशखबरी दी।
- इससे पता चलता है कि इस्लाम इंसान को केवल डराता नहीं बल्कि डर के साथ उम्मीद भी देता है।
- जहन्नम का डर हमें गुनाहों से रोकता है और जन्नत की उम्मीद हमें नेक अमाल की तरफ़ ले जाती है।
5. संख्या नहीं, ईमान और अमल असली कामयाबी है
आज दुनिया में किसी व्यक्ति की हैसियत उसकी दौलत, शोहरत या फॉलोअर्स से मापी जाती है।
लेकिन क़ियामत के दिन असली कामयाबी यह होगी कि इंसान अल्लाह के सामने किस हालत में पहुंचा।
इसलिए हमें लोगों की संख्या बढ़ाने से पहले अपने ईमान और अमाल को बेहतर बनाने की चिंता करनी चाहिए।
क़ियामत की दहशत से बचने के लिए हमें क्या करना चाहिए?
हमें अपनी ज़िंदगी में कुछ बुनियादी चीज़ों पर विशेष ध्यान देना चाहिए:
तौहीद:
अल्लाह को एक मानें और हर तरह के शिर्क से बचें।नमाज़:
पाँच वक़्त नमाज़ की पाबंदी करें और उसे अपनी ज़िंदगी का बुनियादी हिस्सा बनाएं।तौबा:
गुनाह हो जाए तो तुरंत अल्लाह से माफी मांगें।क़ुरआन:
क़ुरआन पढ़ें, समझें और अपनी ज़िंदगी में लागू करने की कोशिश करें।सुन्नत:
नबी करीम ﷺ की सुन्नत को अपनी ज़िंदगी का मार्गदर्शन बनाएं।नेक अमाल:
सदक़ा, ज़िक्र, दुआ, रिश्तेदारों के साथ अच्छा व्यवहार और लोगों के हक़ अदा करने की कोशिश करें।हक़ूक़ुल-इबाद:
लोगों पर ज़ुल्म न करें और किसी का हक़ न मारें।एक बेहद अहम बात: सिर्फ़ डरना काफी नहीं
क़ियामत की हदीसें पढ़कर अगर इंसान कुछ देर डरता है और फिर अपनी पुरानी ज़िंदगी में लौट जाता है तो असल मक़सद पूरा नहीं हुआ।
हदीस का मक़सद यह है कि हमारे अंदर जवाबदेही का एहसास पैदा हो।
जब इंसान को याद रहता है कि उसे एक दिन अल्लाह के सामने खड़ा होना है, तो वह अपनी ज़बान, निगाह, कमाई, रिश्तों और आमाल पर निगरानी रखना शुरू करता है।
यही आख़िरत की तैयारी है।
हर मुसलमान को अपने आप से यह सवाल पूछना चाहिए
आज अगर हमसे पूछा जाए:
मैं किसके लिए जी रहा हूँ?
तो हमारा जवाब क्या होगा?
अगर हमारी पूरी ज़िंदगी सिर्फ़ दुनिया कमाने, शोहरत हासिल करने और अपनी इच्छाओं को पूरा करने में गुज़र रही है, तो हमें रुककर सोचना चाहिए।
क्योंकि दुनिया की उम्र चाहे कितनी भी लंबी हो, आख़िरकार मौत आएगी और उसके बाद वह सफ़र शुरू होगा जिसका कोई अंत नहीं।
इसलिए समझदारी इसी में है कि इंसान दुनिया में रहते हुए अपनी आख़िरत बना ले।
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Conclusion:
सहीह बुखारी और सहीह मुस्लिम की यह हदीस क़ियामत के दिन की भयावहता के साथ-साथ उम्मते-मुहम्मदिया के लिए एक बड़ी खुशखबरी भी अपने अंदर समेटे हुए है। हदीस में Har 1000 Me 999 Jahannami का ज़िक्र सुनकर सहाबा किराम रज़ी अल्लाहु अन्हुम चिंतित हो गए थे, लेकिन नबी करीम ﷺ ने स्पष्ट किया कि उन 1000 में बड़ी संख्या याजूज-माजूज की होगी और फिर अपनी उम्मत के लिए जन्नत में बड़ी हिस्सेदारी की उम्मीद ज़ाहिर फ़रमाई।
इस हदीस का सबसे बड़ा संदेश यह है कि क़ियामत को केवल पढ़ना नहीं, बल्कि उसके लिए तैयारी करना है।
हमें अपनी नमाज़ की फ़िक्र करनी है, तौहीद को मज़बूत करना है, शिर्क और गुनाहों से बचना है, लोगों के हक़ अदा करने हैं और अल्लाह तआला से सच्ची तौबा करते हुए उसकी रहमत की उम्मीद रखनी है।
याद रखिए—
आज हमारे पास अमल का मौक़ा है, लेकिन क़ियामत के दिन अमल का मौक़ा नहीं होगा।
आज अगर हम अल्लाह की तरफ़ लौट आएं तो यही हमारी सबसे बड़ी कामयाबी है।
🤲 अल्लाह तआला हमें सच्चा ईमान, नेक अमल, सुन्नत की पैरवी और क़ियामत के दिन अपनी रहमत से जन्नतुल फ़िरदौस अता फ़रमाए तथा जहन्नम के अज़ाब से महफ़ूज़ फ़रमाए।
आमीन या रब्बल-आलमीन।
हदीस का हवाला:
सहीह अल-बुख़ारी: हदीस नं. 3348 — हज़रत अबू सईद ख़ुदरी रज़ी अल्लाहु अन्हा से रिवायत।
सहीह मुस्लिम: हदीस नं. 222a — हज़रत अबू सईद रज़ी अल्लाहु अन्हा से रिवायत।
Frequently Asked Questions (FAQs)
Q1. क़ियामत के दिन हर 1000 में 999 जहन्नम में क्यों जाएंगे?
हदीस में हर 1000 में से 999 को जहन्नम वालों में से अलग करने का ज़िक्र है। नबी करीम ﷺ ने आगे स्पष्ट किया कि उन 1000 में बड़ी संख्या याजूज-माजूज की होगी।
Q2. क्या हर 1000 मुसलमानों में 999 जहन्नम में जाएंगे?
नहीं। हदीस को इस तरह समझना सही नहीं। नबी ﷺ ने बताया कि उन 1000 में 999 याजूज-माजूज होंगे और तुममें से एक होगा। इसके बाद आपने उम्मते-मुहम्मदिया के लिए जन्नत में बड़ी हिस्सेदारी की उम्मीद भी ज़ाहिर फ़रमाई।
Q3. याजूज और माजूज कौन हैं?
याजूज और माजूज क़ुरआन और सहीह अहादीस में वर्णित एक बड़ी क़ौम है, जिसका क़ियामत की निशानियों से संबंध है।
Q4. क़ियामत के दिन बच्चे बूढ़े क्यों हो जाएंगे?
हदीस में उस समय की अत्यंत भयावह दहशत का वर्णन किया गया है। इसी शिद्दत के कारण बच्चों के बूढ़े हो जाने और लोगों के मदहोश जैसे दिखाई देने का उल्लेख आया है।
Q5. क्या उम्मते-मुहम्मदिया जन्नत वालों की आधी होगी?
नबी करीम ﷺ ने अपनी उम्मत के बारे में उम्मीद ज़ाहिर फ़रमाई कि वे जन्नत वालों का एक चौथाई, फिर एक तिहाई और फिर आधा हिस्सा होंगे।
Q6. इस हदीस से हमें सबसे बड़ा सबक क्या मिलता है?
सबसे बड़ा सबक यह है कि क़ियामत और आख़िरत को याद रखते हुए आज ही अपने ईमान और आमाल को सुधारना चाहिए। इंसान को अल्लाह की रहमत की उम्मीद के साथ जहन्नम से बचने की पूरी कोशिश करनी चाहिए।
🛑 एक याद रखने वाली बात
क़ियामत का दिन आने वाला है, हिसाब होने वाला है और हर इंसान को अपने रब के सामने खड़ा होना है। इसलिए आख़िरत की तैयारी को कल पर न छोड़ें—क्योंकि मौत का वक़्त किसी को मालूम नहीं।

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